43 साल बाद फिर बहने लगी प्रेम की धारा, नदिया के पार बड़े पर्दे पर गांव की कहानी की वापसी

43 साल बाद फिर बहने लगी प्रेम की धारा, नदिया के पार बड़े पर्दे पर गांव की कहानी की वापसी

प्रेषित समय :20:35:59 PM / Sat, Dec 20th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में सिर्फ देखी नहीं जातीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसी ही एक अमर कृति है ‘नदिया के पार’, जो 43 साल बाद एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौट रही है। 1982 में रिलीज हुई इस फिल्म ने न सिर्फ भोजपुरी और हिंदी सिनेमा की सीमाओं को तोड़ा, बल्कि गांव, परंपरा, रिश्तों और प्रेम की उस सरल दुनिया को पर्दे पर उतारा, जिसकी खुशबू आज भी दर्शकों के दिलों में बसी हुई है। अब जब यह फिल्म दोबारा सिनेमाघरों में दिखाई जाएगी, तो यह केवल एक री-रिलीज नहीं, बल्कि समय के साथ बंधी यादों का उत्सव बन गई है।

राजश्री प्रोडक्शंस की इस क्लासिक फिल्म की वापसी बिहार की राजधानी पटना से हो रही है, जहां बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कॉर्पोरेशन के ‘कॉफी विद फिल्म’ कार्यक्रम के तहत इसकी विशेष स्क्रीनिंग रखी गई है। गांधी मैदान स्थित रीजेंट सिनेमा कैंपस के हाउस ऑफ वैरायटी में होने वाली यह स्क्रीनिंग सिनेप्रेमियों के लिए किसी सौगात से कम नहीं है। बिहार सरकार के कला, संस्कृति और युवा विभाग की यह पहल सिर्फ एक फिल्म दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और सिनेमा की विरासत से जोड़ना भी है। बताया जा रहा है कि फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद चर्चा सत्र भी आयोजित हो सकता है, जहां दर्शक इस फिल्म के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व पर संवाद कर सकेंगे।

‘नदिया के पार’ उस दौर की कहानी कहती है, जब सिनेमा में भव्य सेट, भारी संवाद या तकनीकी चकाचौंध नहीं, बल्कि भावनाओं की सादगी सबसे बड़ी ताकत होती थी। फिल्म की कहानी केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ से प्रेरित है, जिसे गोविंद मूनिस ने बेहद संवेदनशील निर्देशन के साथ पर्दे पर उतारा। चंदन और गुंजा की प्रेमकथा सिर्फ दो किरदारों की कहानी नहीं, बल्कि पूरे गांव, उसकी परंपराओं और रिश्तों की सामूहिक भावना को दर्शाती है। नदिया, खेत, आंगन, लोकगीत और सामाजिक मर्यादाएं मिलकर इस फिल्म को एक जीवंत अनुभव बनाती हैं।

फिल्म में सचिन पिलगांवकर और साधना सिंह की जोड़ी ने जो जादू रचा, वह आज भी उतना ही असरदार है। दोनों की मासूम अदाकारी और स्वाभाविक अभिनय ने दर्शकों को सीधे दिल से जोड़ दिया। बिना किसी बनावटीपन के उन्होंने प्रेम, संकोच और सामाजिक बंधनों के बीच पनपते रिश्ते को इस तरह निभाया कि वह किरदार नहीं, बल्कि असल जिंदगी के लोग लगने लगे। इंद्राणी मुखर्जी और मानेक इरानी जैसे कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों से कहानी को मजबूती दी और फिल्म की ग्रामीण आत्मा को और गहराई दी।

‘नदिया के पार’ की सबसे बड़ी खासियत इसका संगीत है। फिल्म के लोकगीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। “तंग करने का तोसे नाता है गुजरिया” जैसे गीत सिर्फ गाने नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की धड़कन हैं, जिन्हें सुनते ही गांव की गलियों और खेतों की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के गांवों में शूट किए गए दृश्य फिल्म को और भी प्रामाणिक बनाते हैं। यही वजह है कि दशकों बाद भी यह फिल्म नई नहीं लगती, बल्कि हर बार देखने पर एक ताजा अनुभव देती है।

आर्थिक दृष्टि से भी यह फिल्म अपने समय की मिसाल थी। महज 18 लाख रुपये के छोटे से बजट में बनी ‘नदिया के पार’ ने बॉक्स ऑफिस पर पांच करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की थी। उस दौर में यह सफलता किसी चमत्कार से कम नहीं थी। बाद में सूरज बड़जात्या की सुपरहिट फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ को भी इसी कहानी से प्रेरणा मिली, जिसने साबित कर दिया कि पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित कहानियां कभी पुरानी नहीं होतीं।

43 साल बाद जब यह फिल्म फिर से सिनेमाघरों में दस्तक दे रही है, तो इसका असर सिर्फ पुराने दर्शकों तक सीमित नहीं रहेगा। जिन्होंने इस फिल्म को पहले देखा है, उनके लिए यह नॉस्टैल्जिया का सुनहरा मौका है, जब वे अपनी युवावस्था की यादों में लौट सकेंगे। वहीं, नई पीढ़ी के लिए यह भारतीय सिनेमा की उस धरोहर से रूबरू होने का अवसर है, जिसे उन्होंने शायद अब तक केवल किस्सों में सुना होगा या छोटे स्क्रीन पर देखा होगा। बड़े पर्दे पर इस फिल्म की सादगी, उसकी सिनेमैटोग्राफी और लोकगीतों की मिठास बिल्कुल अलग अनुभव देने वाली है।

सोशल मीडिया पर भी फिल्म की री-रिलीज को लेकर उत्साह साफ नजर आ रहा है। कई यूजर्स इसे राजश्री प्रोडक्शंस की पारिवारिक सिनेमा परंपरा का उत्सव बता रहे हैं, तो कई युवा दर्शक पहली बार इसे थिएटर में देखने को लेकर उत्साहित हैं। ऐसे समय में जब सिनेमा अक्सर तेज रफ्तार, बड़े बजट और हाई-ऑक्टेन ड्रामे तक सिमट जाता है, ‘नदिया के पार’ जैसी फिल्म की वापसी यह याद दिलाती है कि सिनेमा का असली जादू भावनाओं और रिश्तों में छिपा होता है।

यह री-रिलीज इस सवाल को भी जन्म देती है कि क्या ‘नदिया के पार’ सिर्फ पटना या चुनिंदा सिनेमाघरों तक सीमित रहेगी, या फिर देशभर में इसका दायरा बढ़ेगा। अगर दर्शकों का उत्साह इसी तरह बना रहा, तो संभव है कि यह क्लासिक फिल्म फिर से पूरे देश में धूम मचाए। फिलहाल इतना तय है कि 43 साल बाद भी ‘नदिया के पार’ की प्रेमधारा सूखी नहीं है, बल्कि नए दर्शकों को अपने साथ बहाने के लिए एक बार फिर तैयार है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-