क्रिसमस 2025 से पहले देश के कई शहरों में विरोध की आहट, जबलपुर से हरिद्वार तक बढ़ा तनाव, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

क्रिसमस 2025 से पहले देश के कई शहरों में विरोध की आहट, जबलपुर से हरिद्वार तक बढ़ा तनाव, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

प्रेषित समय :19:53:09 PM / Tue, Dec 23rd, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. साल 2025 की विदाई और क्रिसमस के उल्लास के बीच देश के कई हिस्सों से आई तनाव और हंगामे की खबरों ने जश्न के माहौल को भारी असुरक्षा और वैमनस्य में तब्दील कर दिया है.  23 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से लेकर मध्य प्रदेश के जबलपुर और देवभूमि उत्तराखंड के हरिद्वार तक विरोध प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों की ऐसी कड़ियां जुड़ी हैं, जिन्होंने प्रशासन की रातों की नींद उड़ा दी है. जैसे-जैसे क्रिसमस की तारीख नजदीक आ रही है, दक्षिणपंथी संगठनों और ईसाई समुदाय के बीच मतांतरण के आरोपों को लेकर छिड़ी यह जंग अब गलियों और चर्च के दरवाजों तक पहुंच गई है. उधर   हिंदूवादी नेत्री साध्वी प्राची के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया. उनके बयान के बाद वहां भी विरोध और समर्थन में आवाजें उठने लगीं.

 क्रिसमस 2025 आने से पहले ही देश के कई हिस्सों में जिस तरह का माहौल बनता दिख रहा है, उसने प्रशासन से लेकर आम नागरिकों तक की चिंता बढ़ा दी है. हर साल शांति, प्रेम और भाईचारे का संदेश देने वाला यह पर्व इस बार विरोध, बयानबाजी और सड़कों पर दिखती तल्खी की वजह से सुर्खियों में है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में क्रिसमस को लेकर विरोध की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें जबलपुर का नाम भी प्रमुखता से उभरकर आया है. अलग-अलग शहरों में उठे इन विरोधों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में धार्मिक त्योहार अब पहले की तरह सहज और शांतिपूर्ण रह पाएंगे.

प्रदेश के जबलपुर में क्रिसमस से पहले चर्च के बाहर जिस तरह का तनाव देखने को मिला, उसने पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया. यहां कुछ हिंदू संगठनों ने मतांतरण के आरोप लगाते हुए चर्च के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. देखते ही देखते नारेबाजी शुरू हो गई और बात धक्का-मुक्की व मारपीट तक पहुंच गई. मौके पर पहुंची पुलिस ने हालात को संभालने की कोशिश की, लेकिन इस दौरान तनावपूर्ण माहौल बना रहा. स्थानीय लोगों का कहना है कि अचानक हुए इस विरोध ने क्षेत्र में डर और असमंजस की स्थिति पैदा कर दी, क्योंकि क्रिसमस की तैयारियों के बीच ऐसा माहौल किसी ने नहीं सोचा था.

जबलपुर की घटना कोई अकेला मामला नहीं है. उत्तराखंड के हरिद्वार में तीर्थ पुरोहितों और कुछ संगठनों के विरोध के बाद क्रिसमस से जुड़ा एक कार्यक्रम रद्द कर दिया गया. विरोध करने वालों का कहना था कि देवभूमि में इस तरह के आयोजनों को लेकर आपत्ति है, जबकि आयोजकों का तर्क था कि कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और निजी दायरे में होना था. कार्यक्रम रद्द होने की खबर सामने आते ही यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया और देश के अन्य हिस्सों में भी इसे लेकर प्रतिक्रियाएं आने लगीं.

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में भी क्रिसमस को लेकर बयानबाजी ने माहौल गर्मा दिया. हिंदूवादी नेत्री साध्वी प्राची के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया. उनके बयान के बाद वहां भी विरोध और समर्थन में आवाजें उठने लगीं. कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा, तो कुछ ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का मामला बताया. इस बयानबाजी का असर सिर्फ मुजफ्फरनगर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी चर्चाओं का विषय बन गया.

छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से भी क्रिसमस को लेकर विरोध की छिटपुट खबरें सामने आईं. कहीं पोस्टर लगाए गए, तो कहीं सोशल मीडिया पर अभियान चलाए गए. इन सबके बीच एक समान बात यह रही कि अधिकतर विरोध मतांतरण के आरोपों के इर्द-गिर्द घूमता रहा. विरोध करने वाले संगठनों का दावा है कि वे धर्मांतरण के खिलाफ हैं और प्रशासन को सतर्क करना चाहते हैं, जबकि चर्च और ईसाई समुदाय से जुड़े लोगों ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि क्रिसमस एक धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है, न कि किसी तरह की जबरन गतिविधि का माध्यम.

इन घटनाओं के बाद प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. जबलपुर में पुलिस और जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात किया. अधिकारियों का कहना है कि किसी भी शिकायत की जांच कानून के तहत की जाएगी, लेकिन अफवाहों और भीड़ के दबाव में कोई कार्रवाई नहीं होगी. इसी तरह अन्य राज्यों में भी प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है और स्पष्ट किया है कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

सोशल मीडिया ने इस पूरे घटनाक्रम को और तेज कर दिया है. विरोध, बयान और घटनाओं के वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं. कुछ पोस्ट लोगों में आक्रोश बढ़ा रही हैं, तो कुछ शांति और संयम की अपील कर रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अधूरी या भ्रामक जानकारी इस तरह के मामलों में आग में घी का काम करती है. ऐसे में मीडिया और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है.

धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इन घटनाओं पर चिंता जताई है. उनका कहना है कि भारत की पहचान विविधता और सह अस्तित्व से है, और किसी भी त्योहार को लेकर हिंसा या तनाव इस मूल भावना के खिलाफ है. उन्होंने संवाद और आपसी समझ से समाधान निकालने की बात कही है. कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि मतांतरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कानून मौजूद हैं, इसलिए सड़क पर विरोध की बजाय कानूनी प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए.

क्रिसमस से पहले जिस तरह देश के कई हिस्सों में विरोध और तनाव की खबरें सामने आई हैं, उसने आम लोगों के मन में भी सवाल पैदा कर दिए हैं. क्या आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ेंगे या प्रशासन और समाज मिलकर स्थिति को संभाल पाएंगे? क्या त्योहारों की खुशियां डर और तनाव के साये में मनाई जाएंगी या फिर शांति और भाईचारे का संदेश फिर से मजबूत होगा? इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं.

इतना जरूर है कि जबलपुर से हरिद्वार और मुजफ्फरनगर तक फैली यह घटनाएं एक संकेत हैं कि धार्मिक आयोजनों को लेकर संवेदनशीलता और समझदारी की पहले से कहीं ज्यादा जरूरत है. क्रिसमस जैसे पर्व, जो प्रेम और करुणा का संदेश देते हैं, अगर विवाद का कारण बनते हैं तो यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का समय है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि देश इस परीक्षा से किस तरह गुजरता है और क्या त्योहारों की असली भावना कायम रह पाती है या नहीं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-