जबलपुर. नए साल के जश्न की आहट के बीच जब पूरा देश उत्सव की तैयारी में डूबा है, तब नशे के सौदागरों ने मध्य प्रदेश की शांति में जहर घोलने की एक बड़ी और सनसनीखेज साजिश रची थी, जिसे जबलपुर एसटीएफ के जांबाजों ने अपनी सूझबूझ से नाकाम कर दिया है। यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी रोमांचक है, जिसमें घने जंगल का सन्नाटा, एक रहस्यमयी ट्रक और एसटीएफ की घेराबंदी शामिल है। जैसे-जैसे दिसंबर की सर्द रातें गहरा रही हैं और 31 दिसंबर की पार्टियों के लिए डिमांड बढ़ रही है, वैसे-वैसे तस्करों के सिंडिकेट ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी थी। ओडिशा की वादियों से निकला एक ट्रक, जिसमें आम सामान की आड़ में मौत का सामान यानी गांजा छिपा था, अनूपपुर जिले के जेतहरी थाना क्षेत्र के उन रास्तों से गुजर रहा था जहाँ परिंदा भी पर मारने से हिचकिचाता है। तस्करों का मानना था कि घने जंगलों के ये ऊबड़-खाबड़ रास्ते उन्हें कानून की नजरों से बचा ले जाएंगे, लेकिन वे यह भूल गए थे कि खाकी की नजरें उन पर जमी हुई थीं।
जबलपुर एसटीएफ को जैसे ही अपने विश्वसनीय सूत्रों से सूचना मिली कि एक बड़ी खेप सीमा पार कर प्रदेश में दाखिल होने वाली है, विभाग में हड़कंप मच गया और तुरंत दो विशेष टीमों का गठन किया गया। यह ऑपरेशन इतना गोपनीय था कि इसकी भनक स्थानीय पुलिस तक को नहीं लगने दी गई। एसटीएफ के जवानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर अनूपपुर के बीहड़ जंगलों में मोर्चा संभाला। सुबह के वक्त जब सूरज की किरणें पेड़ों की ओट से झांक रही थीं, तभी दूर से एक ट्रक की आवाज ने सन्नाटे को तोड़ा। यह वही संदिग्ध ट्रक था जिसका इंतजार टीमें घंटों से कर रही थीं। घेराबंदी इतनी पुख्ता थी कि तस्करों को संभलने का मौका तक नहीं मिला। जब ट्रक को रोका गया, तो पहली नजर में वह बिल्कुल सामान्य लग रहा था, लेकिन अनुभवी अफसरों की निगाहों ने ट्रक की बनावट में कुछ असामान्य ताड़ लिया। ट्रक के भीतर लोहे की चादरों को इस चतुराई से वेल्डिंग करके एक गुप्त चैंबर (कम्पार्टमेंट) बनाया गया था कि कोई साधारण व्यक्ति उसे पहचान ही न पाए।
जब उस गुप्त खाने को खोला गया, तो एसटीएफ के अधिकारियों की आंखें फटी की फटी रह गईं। वहां रखे खाकी रंग के पैकेटों में भरा था उच्च गुणवत्ता वाला 599 किलो गांजा। यह मात्रा कोई छोटी-मोटी नहीं थी, बल्कि इसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लगभग एक करोड़ 80 लाख रुपये आंकी गई है। इतनी बड़ी खेप का पकड़ा जाना इस बात का प्रमाण है कि नशे का यह काला कारोबार कितने बड़े स्तर पर जड़ें जमा चुका है। मौके से पुलिस ने अंकित विश्वकर्मा और धनंजय सिंह पटेल नाम के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जो इस मौत के व्यापार के मोहरे मात्र नजर आते हैं। प्रारंभिक पूछताछ में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। बताया जा रहा है कि यह खेप नए साल के जश्न के दौरान प्रदेश के अलग-अलग शहरों में सप्लाई की जानी थी, जहाँ रेव पार्टियों और क्लबों में इसे खपाने की योजना थी।
जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ओडिशा से अनूपपुर तक यह ट्रक इतने नाकों को पार कर कैसे पहुंच गया? क्या इस तस्करी के पीछे कोई बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय गिरोह है? एसटीएफ के अधिकारी अब इन्हीं कड़ियों को जोड़ने में जुटे हैं। गिरफ्तार किए गए आरोपियों से कड़ी पूछताछ की जा रही है ताकि उस 'मास्टरमाइंड' तक पहुंचा जा सके जो सुरक्षित बैठकर इन युवाओं के जीवन से खिलवाड़ कर रहा है। यह पूरी कार्रवाई केवल एक जब्ती नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए एक राहत की खबर है जिनके बच्चे नशे की इस दलदल में फंस सकते थे। जबलपुर एसटीएफ की इस जांबाजी ने यह साफ कर दिया है कि अपराधी चाहे जितने भी शातिर क्यों न हों और रास्ते चाहे जितने भी दुर्गम हों, कानून के हाथ उन तक पहुंच ही जाते हैं।
जैसे-जैसे तफ्तीश आगे बढ़ रही है, कई बड़े नामों के चेहरे बेनकाब होने की संभावना बढ़ गई है। यह गांजा कहाँ जाना था, किसने इसे मंगवाया था और इस नेटवर्क के लिए फंडिंग कहाँ से हो रही थी, ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब पूरा प्रदेश जानना चाहता है। फिलहाल, जेतहरी के उन जंगलों में अभी भी एसटीएफ की हलचल बनी हुई है और साक्ष्यों को बारीकी से जुटाया जा रहा है। नए साल के उल्लास के बीच इस बड़ी कामयाबी ने पुलिस महकमे का मनोबल सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। आम जनता में भी इस कार्रवाई के बाद एक विश्वास जागा है कि प्रशासन उनके बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए तत्पर है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इस एक करोड़ अस्सी लाख के गांजे के पीछे छिपे असली गुनहगारों का चेहरा कब जनता के सामने आता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

