संस्कारधानी बना प्रदेश का पहला अभेद्य इलेक्ट्रिकल आइलैंड, संकट में भी नहीं थमेगी शहर की बिजली

संस्कारधानी बना प्रदेश का पहला अभेद्य इलेक्ट्रिकल आइलैंड, संकट में भी नहीं थमेगी शहर की बिजली

प्रेषित समय :19:01:18 PM / Sat, Dec 27th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर.मध्य प्रदेश की न्यायधानी और संस्कारधानी अब अंधेरे के किसी भी संभावित खतरे से पूरी तरह मुक्त हो गई है. जब पूरा देश या प्रदेश कभी किसी बड़े ग्रिड फेल्योर के कारण अंधेरे में डूबा होगा, तब भी जबलपुर की सड़कें रोशन होंगी, अस्पतालों के वेंटिलेटर निर्बाध चलेंगे और देश की सुरक्षा में तैनात आयुध निर्माणियां पूरी क्षमता के साथ गरजती रहेंगी. यह चमत्कार संभव हुआ है 'इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग' प्रोजेक्ट के सफल क्रियान्वयन से, जिसने जबलपुर को पूरे मध्य प्रदेश में एक अनूठा और सुरक्षित ऊर्जा द्वीप बना दिया है. आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह आइलैंडिंग सिस्टम है क्या और कैसे यह शहर को पूरी दुनिया से अलग बिजली की सुरक्षा देगा. दरअसल, अब तक की व्यवस्था में जबलपुर की बिजली आपूर्ति राज्य और नेशनल ग्रिड से जुड़ी हुई थी, जिसका अर्थ यह था कि यदि कहीं दूर किसी पावर स्टेशन में कोई बड़ी तकनीकी खराबी आती या ग्रिड ट्रिप होता, तो उसका असर सीधे जबलपुर पर पड़ता और पूरा शहर ब्लैकआउट का शिकार हो जाता. लेकिन अब इस नई तकनीक के साथ जबलपुर ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा की एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच ली है जिसे पार करना किसी भी तकनीकी खराबी के लिए असंभव होगा.

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह संकट के समय बिजली घर और शहर के बीच एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी. जैसे ही नेशनल ग्रिड में कोई अस्थिरता या फ्रीक्वेंसी में उतार-चढ़ाव महसूस होगा, जबलपुर का सिस्टम खुद को मुख्य ग्रिड से पलक झपकते ही अलग कर लेगा. इस प्रक्रिया को ही 'आइलैंडिंग' कहा जाता है. पृथक होते ही शहर की अपनी उत्पादन इकाइयां और स्थानीय सब-स्टेशन एक आंतरिक नेटवर्क बना लेंगे, जिससे बिजली की आपूर्ति ठप नहीं होगी. जनता के बीच इस बात को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता है कि क्या अब जबलपुर में कभी बिजली नहीं जाएगी. इसका उत्तर बहुत ही सकारात्मक है क्योंकि यह सिस्टम विशेष रूप से उन स्थितियों के लिए डिजाइन किया गया है जब बड़े स्तर पर पावर कट का खतरा होता है. खासकर रक्षा इकाइयों जैसे जीसीएफ, ओएफके और वीएफजे के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि यहां देश की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण उपकरणों का निर्माण होता है और बिजली का एक सेकंड का जाना भी बड़े नुकसान का कारण बन सकता है.

अस्पतालों की बात करें तो मेडिकल कॉलेज से लेकर जिला अस्पताल तक, अब सर्जरियां और इमरजेंसी सेवाएं बिजली जाने के डर से मुक्त होंगी. अक्सर देखा गया है कि बड़े पावर फेल्योर के समय मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं भी प्रभावित होती हैं, लेकिन जबलपुर के आइलैंड बनने के बाद यहां के संचार टावर भी सक्रिय रहेंगे. यह प्रोजेक्ट तकनीकी कौशल और दूरदर्शिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने जबलपुर को तकनीकी मानचित्र पर इंदौर और भोपाल जैसे शहरों से भी आगे खड़ा कर दिया है. शहरवासियों के लिए यह खबर किसी उत्सव से कम नहीं है क्योंकि अब उन्हें उस 'ग्रिड फेल' शब्द से डरने की जरूरत नहीं है जो अक्सर बड़े शहरों की रफ्तार रोक देता था. प्रशासन और बिजली विभाग के विशेषज्ञों ने रात-दिन की मेहनत के बाद इस जटिल सिस्टम को स्थापित किया है, जिसमें सेंसर्स और ऑटोमैटिक स्विचगियर की एक पूरी श्रृंखला काम करती है. यह सिस्टम इतना संवेदनशील है कि यह खतरे को मानव मस्तिष्क से भी तेज भांप लेता है और सुरक्षात्मक मोड में चला जाता है.

जबलपुर के आम नागरिकों के मन में उठने वाली जिज्ञासाओं को शांत करते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल तारों का जाल बिछाना नहीं है, बल्कि एक स्मार्ट तकनीक का उपयोग है जो बिजली की फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करती है. जब बाहर का ग्रिड फेल होता है, तो शहर के भीतर की मांग और आपूर्ति को संतुलित करना सबसे बड़ी चुनौती होती है, जिसे यह नया आइलैंडिंग प्रोजेक्ट बड़ी सहजता से संभाल लेगा. आने वाले समय में यह मॉडल पूरे मध्य प्रदेश के लिए एक बेंचमार्क साबित होगा. आज जब जबलपुर की जनता इस उपलब्धि पर गर्व कर रही है, तो यह स्पष्ट है कि संस्कारधानी अब न केवल अपनी संस्कृति के लिए बल्कि अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता और सुरक्षा के लिए भी पहचानी जाएगी. अंधेरे के विरुद्ध इस युद्ध में जबलपुर ने जीत हासिल कर ली है और अब यहां की रातें पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और चमकती हुई नजर आएंगी. यह विकास की वह नई किरण है जो यह सुनिश्चित करती है कि संकट चाहे कैसा भी हो, जबलपुर की धड़कन यानी इसकी बिजली कभी नहीं थमेगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-