दिल्ली में आवारा कुत्तों की गिनती को लेकर उठा सियासी और प्रशासनिक बवाल, शिक्षकों की भूमिका पर सरकार ने दी सफाई

दिल्ली में आवारा कुत्तों की गिनती को लेकर उठा सियासी और प्रशासनिक बवाल, शिक्षकों की भूमिका पर सरकार ने दी सफाई

प्रेषित समय :22:52:14 PM / Mon, Dec 29th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या के बीच एक प्रशासनिक आदेश ने अचानक राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। दिनभर यह खबर सुर्खियों में बनी रही कि दिल्ली सरकार ने आवारा कुत्तों की गिनती के लिए स्कूल शिक्षकों को तैनात कर दिया है। जैसे ही यह सूचना सामने आई, शिक्षक संगठनों से लेकर विपक्षी दलों तक ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। हालांकि, बढ़ते विवाद के बीच दिल्ली सरकार और शिक्षा विभाग ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि शिक्षकों से कुत्तों की गिनती कराने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

दरअसल, यह पूरा विवाद शिक्षा निदेशालय की कार्यवाहक शाखा द्वारा जारी एक सर्कुलर के बाद शुरू हुआ। सर्कुलर में शिक्षा अधिकारियों से उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्कूलों, स्टेडियमों और खेल परिसरों में नोडल अधिकारियों की जानकारी जुटाने को कहा गया था। इस जानकारी में संबंधित अधिकारी का नाम, पदनाम, मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी शामिल करने के निर्देश दिए गए थे। जैसे ही यह आदेश सामने आया, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि शिक्षकों को आवारा कुत्तों की गिनती के काम में लगाया जा रहा है। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया और सरकार की आलोचना शुरू हो गई।

शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया कि आदेश का गलत अर्थ निकाला गया है। विभाग के अनुसार, स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को केवल आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में समन्वय के लिए नोडल अधिकारियों को नामित करने को कहा गया है, न कि शिक्षकों को फील्ड में उतरकर गिनती करने का निर्देश दिया गया है। विभाग का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया जिला स्तर पर समन्वय और सूचना संकलन के लिए है, ताकि संबंधित एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल बनाया जा सके।

सरकार की ओर से यह भी साफ किया गया कि स्कूलों को व्यक्तिगत रूप से कोई रिपोर्ट तैयार कर भेजने की आवश्यकता नहीं है। केवल जिला स्तर पर समेकित रिपोर्ट तैयार कर दिल्ली के मुख्य सचिव के कार्यालय को भेजी जानी है। इसके बावजूद, शिक्षक संगठनों में इस आदेश को लेकर नाराजगी देखने को मिली। उनका कहना है कि ऐसे आदेश अक्सर शिक्षकों को उनके मूल दायित्व यानी पढ़ाने के काम से भटका देते हैं।

न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षक संघों ने इस कदम का कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका तर्क है कि जब स्कूलों में प्री-बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं और शैक्षणिक गतिविधियां अपने चरम पर हैं, तब शिक्षकों पर अतिरिक्त गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां डालना छात्रों के हितों के खिलाफ है। सरकारी शिक्षक संघ के अध्यक्ष संत राम ने कहा कि शिक्षक हमेशा आपात स्थितियों में सरकार के साथ खड़े रहे हैं, चाहे वह कोविड-19 महामारी का दौर हो या अन्य विशेष परिस्थितियां। लेकिन नियमित शैक्षणिक सत्र के दौरान इस तरह के कार्य सौंपना उचित नहीं है।

संत राम के अनुसार, अगर शिक्षकों को केवल शिक्षा पर ध्यान देने दिया जाए, तो यह समाज और देश दोनों के लिए बेहतर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी विशेष ड्यूटी की आवश्यकता है, तो उसे छुट्टियों के दौरान या वैकल्पिक व्यवस्था के तहत दिया जाना चाहिए। पढ़ाई के दिनों में शिक्षकों को कक्षा से बाहर के कामों में उलझाना बच्चों के भविष्य के साथ समझौता करने जैसा है।

वहीं शिक्षा निदेशालय का कहना है कि यह मामला केवल प्रशासनिक समन्वय का है और इसे अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है। विभाग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि यह पूरा अभियान जनता की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में किया जा रहा है। निदेशालय के अनुसार, 7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेशों और 20 नवंबर को हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में दिए गए निर्देशों के तहत यह कदम उठाया गया है। विभाग ने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय बताया है।

आवारा कुत्तों की समस्या दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में गंभीर रूप ले चुकी है। आए दिन कुत्तों के काटने की घटनाएं सामने आती रहती हैं, जिससे आम लोगों में डर का माहौल बना रहता है। सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर चिंता जता चुका है और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को ठोस कदम उठाने के निर्देश दे चुका है। इसी संदर्भ में दिल्ली सरकार विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल और सूचना तंत्र मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में शिक्षकों को पशु गणना या अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगाए जाने के आदेश जारी हो चुके हैं, जिनका शिक्षक संगठनों ने विरोध किया था। इन मामलों में भी यही सवाल उठता रहा है कि क्या शिक्षकों का उपयोग इस तरह के कार्यों के लिए किया जाना उचित है।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है। विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान देने के बजाय शिक्षकों को गैरजरूरी कार्यों में उलझा रही है। वहीं सत्तारूढ़ दल का कहना है कि जनता की सुरक्षा सर्वोपरि है और इसके लिए सभी विभागों को मिलकर काम करना होगा।

दिल्ली में आवारा कुत्तों की गिनती को लेकर उठा यह विवाद प्रशासनिक आदेशों की व्याख्या, शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं और जनता की सुरक्षा जैसे अहम सवालों को सामने लाता है। सरकार की सफाई के बाद भले ही यह स्पष्ट हो गया हो कि शिक्षकों से सीधे गिनती कराने का निर्देश नहीं दिया गया है, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि शिक्षकों की भूमिका और जिम्मेदारियों की सीमाएं कहां तक होनी चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस मुद्दे पर शिक्षक संगठनों की चिंताओं को कैसे संबोधित करती है और आवारा कुत्तों की समस्या के समाधान के लिए कौन से व्यावहारिक कदम उठाए जाते हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-