नई दिल्ली. साल 2025 की विदाई और 2026 के आगमन की दहलीज पर खड़े भारत के लिए एक ऐसी चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है जिसने समाज के नैतिक और आर्थिक ताने-बाने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एडल्ट कंटेंट प्लेटफॉर्म 'ओनलीफैंस' द्वारा जारी ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीयों ने इस एक वर्ष के भीतर अश्लील वीडियो और फोटो देखने के लिए लगभग 1080 करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं. यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि इस व्यय के साथ ही भारत इस वैश्विक प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च करने वाले देशों की सूची में पहले पायदान पर पहुंच गया है. डिजिटल युग में मनोरंजन के बदलते स्वरूप और नैतिकता के गिरते स्तर को देखते हुए विशेषज्ञ इसे एक गंभीर सामाजिक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं. 1080 करोड़ रुपए की यह भारी-भरकम राशि वह पूंजी है जिससे देश के हजारों बेघर परिवारों के लिए आश्रय बनाए जा सकते थे या लाखों गरीब बच्चों की शिक्षा का स्तर सुधारा जा सकता था, लेकिन इसके बजाय यह पैसा केवल क्षणिक वासना और अश्लील मनोरंजन की भेंट चढ़ गया.
हिंदू पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में कलयुग के लक्षणों का जो वर्णन मिलता है, वर्तमान समय की यह सच्चाई उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करती नजर आ रही है. शास्त्रों में उल्लेख है कि जैसे-जैसे समाज में वासना, अधर्म, लालच और बुरा बर्ताव बढ़ेगा, कलियुग अपने चरमोत्कर्ष की ओर अग्रसर होगा. भारतीयों द्वारा अश्लील कंटेंट पर खर्च की गई यह अरबों की राशि इस बात का संकेत है कि डिजिटल क्रांति के इस दौर में मानसिक स्वास्थ्य और चरित्र निर्माण के बजाय उपभोक्तावाद और विकृत मनोरंजन को प्राथमिकता दी जा रही है. ओनलीफैंस जैसे प्लेटफॉर्म, जिसकी शुरुआत 2016 में लंदन में टिम स्टोकली द्वारा की गई थी, आज एक ऐसे बाजार के रूप में उभरे हैं जहाँ 'क्रिएटर्स' अपने निजी और बोल्ड कंटेंट को बेचकर पैसा कमाते हैं और दर्शक उन्हें देखने के लिए मोटी सब्सक्रिप्शन फीस चुकाते हैं. हालांकि इस प्लेटफॉर्म पर फिटनेस, संगीत और कुकिंग के वीडियो भी उपलब्ध हैं, लेकिन वैश्विक रुझान और ताजा रिपोर्ट्स यह स्पष्ट करती हैं कि इसका मुख्य व्यवसाय एडल्ट कंटेंट के इर्द-गिर्द ही सिमटा हुआ है.
भारतीय समाज में इस तरह के कंटेंट की खपत में हुई यह बेतहाशा वृद्धि बताती है कि लोग पारंपरिक मनोरंजन प्लेटफॉर्म्स जैसे कि सिनेमा या ओटीटी के बजाय इन विवादास्पद प्लेटफॉर्म्स की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं. यह रुझान न केवल युवाओं की मानसिकता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस नींव को भी हिला रहा है जो संयम और मर्यादा पर आधारित रही है. 2025 की यह रिपोर्ट एक बड़े आर्थिक पलायन को भी दर्शाती है, क्योंकि भारतीयों द्वारा खर्च किया गया यह पैसा विदेशी कंपनियों के खातों में जा रहा है. इतनी बड़ी धनराशि का अश्लील कंटेंट के लिए व्यर्थ किया जाना यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में एक विकसित समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर तकनीकी उन्नति के आवरण में हम नैतिक पतन की ओर जा रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट की सुलभ उपलब्धता और डिजिटल भुगतान के आसान तरीकों ने इस तरह की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है. साल के आखिरी दिन सामने आई यह रिपोर्ट 2026 की शुरुआत से पहले आत्ममंथन का एक बड़ा अवसर देती है. यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन की हकीकत है जिसे अक्सर पर्दे के पीछे दबा दिया जाता है. यदि समय रहते सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर मूल्यों को पुनर्जीवित नहीं किया गया, तो यह डिजिटल लत भविष्य की पीढ़ियों के चरित्र को और अधिक खोखला कर सकती है. आज जब दुनिया नए साल के संकल्प ले रही है, तब 1080 करोड़ रुपए का यह दाग भारतीय डिजिटल उपभोग के इतिहास में एक कड़वे सच के रूप में दर्ज हो गया है, जो कलियुग के बढ़ते प्रभाव और मानवीय मूल्यों के ह्रास की एक बड़ी कहानी बयां कर रहा है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

