सोशल मीडिया अपराधों पर पुलिस का डिजिटल वार, बिहार–महाराष्ट्र–पंजाब–बंगाल–असम में निगरानी सेल तेज़ी से बढ़े

सोशल मीडिया अपराधों पर पुलिस का डिजिटल वार, बिहार–महाराष्ट्र–पंजाब–बंगाल–असम में निगरानी सेल तेज़ी से बढ़े

प्रेषित समय :22:54:36 PM / Mon, Jan 5th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और इसके जरिए सामने आ रहे नए किस्म के अपराधों को देखते हुए देशभर की पुलिस ने डिजिटल निगरानी को अपनी प्राथमिक रणनीति में शामिल कर लिया है. बीते चार वर्षों में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुलिस के समर्पित सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. उपलब्ध पुलिस अवसंरचना आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 1 जनवरी 2020 को जहां देश के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसे कुल 262 सेल सक्रिय थे, वहीं 1 जनवरी 2024 तक इनकी संख्या बढ़कर 365 हो गई है.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर), स्नैपचैट, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म अब केवल संवाद और अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं रह गए हैं, बल्कि इनके जरिए अफवाह फैलाने, घृणा भाषण, साइबर ठगी, उकसावे, संगठित अपराध और भीड़ हिंसा जैसी गतिविधियों के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं. ऐसे में समय रहते अपराध की पहचान और रोकथाम के लिए विशेष निगरानी तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई, जिसके परिणामस्वरूप राज्यों ने अलग-अलग स्तर पर सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल का विस्तार किया.

आंकड़ों के अनुसार, बिहार इस सूची में सबसे आगे है, जहां कुल 52 सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल सक्रिय हैं. इसके बाद महाराष्ट्र में 50, पंजाब में 48, पश्चिम बंगाल में 38 और असम में 37 ऐसे सेल कार्यरत हैं. खास बात यह है कि कई राज्यों में बीते दो वर्षों में इन सेल की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है, जो सोशल मीडिया आधारित अपराधों के बढ़ते खतरे की ओर इशारा करता है.

असम में सोशल मीडिया निगरानी को लेकर सबसे तेज विस्तार देखने को मिला है. वर्ष 2022 में जहां राज्य में केवल एक सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल था, वहीं 2024 तक इसकी संख्या बढ़कर 37 हो गई. इसी तरह पश्चिम बंगाल में 2022 में केवल दो सेल थे, जो दो वर्षों के भीतर बढ़कर 38 तक पहुंच गए. पंजाब में भी पुलिस ने अपनी डिजिटल क्षमता को दोगुना करते हुए 2022 से 2024 के बीच सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल की संख्या 24 से बढ़ाकर 48 कर दी.

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, सोशल मीडिया अब अपराध की योजना बनाने, फर्जी पहचान बनाने और लोगों को गुमराह करने का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है. साइबर ठग सोशल मीडिया प्रोफाइल के जरिए लोगों को जाल में फंसाते हैं, वहीं कुछ मामलों में साम्प्रदायिक या सामाजिक तनाव भड़काने के लिए भ्रामक वीडियो और पोस्ट तेजी से वायरल किए जाते हैं. ऐसे में निगरानी सेल संदिग्ध पोस्ट, वीडियो और मैसेज पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर संबंधित थानों और साइबर इकाइयों को अलर्ट करते हैं.

अधिकारियों का यह भी कहना है कि इन सेल का उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना नहीं है, बल्कि अपराध से पहले ही संकेतों को पहचानकर उसे रोकना है. कई मामलों में अफवाह या उकसाऊ सामग्री को समय रहते चिन्हित कर हटवाने और संबंधित व्यक्ति को चेतावनी देने से बड़े टकराव या हिंसा को टाला जा सका है. इसी कारण पुलिस महकमा सोशल मीडिया निगरानी को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एक अहम औजार मान रहा है.

विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल आमतौर पर प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम से मिलकर बने होते हैं. ये टीमें ट्रेंडिंग हैशटैग, वायरल कंटेंट, संदिग्ध अकाउंट और आपत्तिजनक गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखती हैं. कुछ राज्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा एनालिटिक्स टूल का भी उपयोग शुरू किया गया है, जिससे बड़ी मात्रा में डेटा का विश्लेषण तेजी से किया जा सके.

हालांकि, सोशल मीडिया निगरानी के बढ़ते दायरे को लेकर निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं. इस पर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि निगरानी केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कंटेंट तक सीमित रहती है और किसी की निजी बातचीत में बिना कानूनी प्रक्रिया के दखल नहीं दिया जाता. उनका दावा है कि सभी कार्रवाइयां कानून और तय दिशा-निर्देशों के तहत ही की जाती हैं.

देश में डिजिटल अपराधों की बढ़ती संख्या के बीच पुलिस की यह पहल आने वाले समय में और व्यापक होने की संभावना जताई जा रही है. अधिकारियों के मुताबिक, जैसे-जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और तकनीक विकसित हो रही है, वैसे-वैसे अपराध के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्यों को न केवल निगरानी सेल की संख्या बढ़ानी होगी, बल्कि उन्हें तकनीकी रूप से और अधिक सक्षम बनाना भी जरूरी होगा.

चार वर्षों में सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल की संख्या में हुआ यह इजाफा दर्शाता है कि पुलिस अब पारंपरिक अपराधों के साथ-साथ डिजिटल दुनिया में पनप रहे खतरों को भी गंभीरता से ले रही है. बदलते अपराध परिदृश्य में यह कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-