पटना. बिहार के सर्राफा बाजार से एक ऐसा फरमान निकला है जिसने न केवल व्यापारिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि राज्य की राजनीति में भी एक नया ध्रुवीकरण खड़ा कर दिया है. ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्ड फेडरेशन (AIJGF) की बिहार इकाई ने बुधवार, 7 जनवरी 2026 को एक बड़ा ऐलान करते हुए स्पष्ट किया है कि अब राज्य की आभूषण दुकानों में बुर्का, नकाब, हिजाब, मास्क या हेलमेट पहनकर चेहरा ढके हुए ग्राहकों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा. फेडरेशन का तर्क है कि सोने और चांदी की आसमान छूती कीमतों के बीच दुकानों की सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन विपक्षी दलों ने इसे सीधे तौर पर एक खास समुदाय को लक्षित करने वाला और असंवैधानिक कदम करार दिया है. राजधानी पटना में मीडिया से मुखातिब होते हुए फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष अशोक कुमार वर्मा ने साफ लहजे में कहा कि खरीदारी के समय पहचान सुनिश्चित करने के लिए ग्राहक का चेहरा दिखना अनिवार्य है, अन्यथा उन्हें दुकान के भीतर एंट्री नहीं मिलेगी.
इस निर्णय की पृष्ठभूमि में फेडरेशन ने हाल के दिनों में हुई लूटपाट और चोरी की सिलसिलेवार घटनाओं का हवाला दिया है. अशोक वर्मा के मुताबिक, आज जब 10 ग्राम सोने की कीमत लगभग 1.40 लाख रुपए और एक किलोग्राम चांदी 2.5 लाख रुपए के स्तर को छू रही है, तब सर्राफा व्यापारियों की सुरक्षा दांव पर लगी है. उन्होंने आरोप लगाया कि नकाबपोश अपराधी, जिनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल होते हैं, समूह बनाकर दुकानों में घुसते हैं और अपनी पहचान छिपाकर बड़ी वारदातों को अंजाम देते हैं. फेडरेशन का दावा है कि यह निर्देश किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह उन पुरुषों पर भी समान रूप से लागू होता है जो हेलमेट या स्कार्फ से चेहरा ढक कर आते हैं. हालांकि, 'बुर्का' और 'नकाब' जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने इस पूरे मामले को धार्मिक रंग दे दिया है, जिसे लेकर अब बिहार की सियासत में उबाल आ गया है.
राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने इस फैसले पर तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. आरजेडी के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने इसे भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपराओं और संवैधानिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है. अहमद का कहना है कि किसी भी निजी संस्था या फेडरेशन को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी नागरिक के पहनावे के आधार पर उसकी धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करे. आरजेडी ने इस कदम के पीछे भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस की विचारधारा का हाथ होने का आरोप लगाया है. विपक्षी नेताओं का तर्क है कि सुरक्षा के नाम पर किसी महिला का बुर्का या हिजाब हटाने की जिद करना न केवल अपमानजनक है, बल्कि यह देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की एक सोची-समझी साजिश है. उनका कहना है कि सुरक्षा के लिए सीसीटीवी और मेटल डिटेक्टर जैसे आधुनिक उपकरणों का सहारा लिया जाना चाहिए, न कि किसी की धार्मिक पहचान पर चोट की जानी चाहिए.
दूसरी ओर, सर्राफा व्यापारियों का संगठन अपनी बात पर अडिग है और उनका कहना है कि उन्होंने इस संबंध में पटना के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से भी चर्चा की है, जिन्होंने सुरक्षा के दृष्टिकोण से इस नियम पर कोई आपत्ति नहीं जताई है. फेडरेशन ने स्पष्ट किया है कि वे हिजाब या बुर्के पर प्रतिबंध नहीं लगा रहे हैं, बल्कि केवल लेनदेन और प्रवेश के वक्त चेहरा दिखाने का 'अनुरोध' कर रहे हैं. बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जहाँ पूरे प्रदेश में इस तरह का निर्देश प्रभावी रूप से लागू करने की घोषणा की गई है. इस घोषणा के बाद से ही पटना समेत कई जिलों के आभूषण शोरूम्स के बाहर सुरक्षा प्रोटोकॉल के बोर्ड लगने शुरू हो गए हैं. अब देखना यह होगा कि यह विवाद केवल बयानों तक सीमित रहता है या सड़क और अदालत तक पहुँचता है, क्योंकि एक तरफ व्यापारियों की जान-माल की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों और मजहबी रवायतों की रक्षा की दुहाई दी जा रही है. इस समय पूरा प्रदेश इस बात को लेकर बंटा हुआ नजर आ रहा है कि क्या सुरक्षा के नाम पर व्यक्तिगत पहचान को सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जा सकता है, या फिर यह फैसला किसी गहरे राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है.
इस संवेदनशील और चर्चित विषय पर सोशल मीडिया पर जुड़ाव बढ़ाने के लिए आप निम्नलिखित पोल और चर्चा के प्रश्न इस्तेमाल कर सकते हैं:
सोशल मीडिया पोल
प्रश्न: क्या सर्राफा दुकानों की सुरक्षा के लिए 'चेहरा दिखाने' का नियम सही है?
हाँ, सुरक्षा जरूरी है.
नहीं, यह निजी स्वतंत्रता है.
विकल्प 2 (Twitter/X के लिए):
प्रश्न: बिहार ज्वैलर्स फेडरेशन के 'नो फेस कवर' नियम को आप कैसे देखते हैं?
पूरी तरह सुरक्षात्मक कदम
धार्मिक स्वतंत्रता में दखल
केवल अपराधियों के लिए हो
राजनीति से प्रेरित
चर्चा के लिए मुख्य प्रश्न
-
क्या आधुनिक सीसीटीवी और तकनीक के युग में किसी का चेहरा दिखाना अनिवार्य करना ही सुरक्षा का एकमात्र उपाय है? अपनी राय दें.
-
फेडरेशन का कहना है कि यह नियम हेलमेट और मास्क पहनने वाले पुरुषों पर भी लागू है. क्या आपको लगता है कि इसे धार्मिक चश्मे से देखा जाना गलत है?
-
क्या विपक्षी दलों द्वारा इस व्यावसायिक सुरक्षा नियम को 'असंवैधानिक' बताना सही है, या यह केवल राजनीति है?
-
क्या आपने कभी किसी शोरूम में सुरक्षा के कारण पहचान दिखाने में असहजता महसूस की है? #GoldSecurity #BiharNews

