दूषित पेयजल पर हाईकोर्ट में नामजद जनहित याचिका, जबलपुर में वर्षों से गंदे पानी की सप्लाई पर उठे तीखे सवाल

दूषित पेयजल पर हाईकोर्ट में नामजद जनहित याचिका, जबलपुर में वर्षों से गंदे पानी की सप्लाई पर उठे तीखे सवाल

प्रेषित समय :20:25:48 PM / Wed, Jan 7th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका के माध्यम से जबलपुर शहर में घर-घर नलों से पहुंच रहे संक्रमित और गंदे पेयजल की आपूर्ति को सीधे तौर पर कठघरे में खड़ा किया गया है. इस याचिका में नगर निगम जबलपुर के आयुक्त, महापौर, जिला कलेक्टर, प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन विभाग तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को विधिवत पक्षकार बनाया गया है. याचिकाकर्ता ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट से शीघ्र सुनवाई की मांग की है, ताकि लाखों नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़े इस मुद्दे पर त्वरित और ठोस हस्तक्षेप हो सके.

यह जनहित याचिका तुलसी नगर निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता ओपी यादव द्वारा दायर की गई है, जिनकी ओर से हाईकोर्ट में अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता पैरवी कर रहे हैं. याचिकाकर्ता ओपी यादव डेमोक्रेटिक लॉयर्स फोरम के अध्यक्ष भी हैं. याचिका में उन्होंने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि जबलपुर शहर में गंदे और दूषित पानी की समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि वर्ष 2019 से लगातार सामने आ रही है. बीते छह वर्षों में उन्होंने और क्षेत्र के रहवासियों ने नगर निगम और संबंधित विभागों से कई बार शिकायतें कीं, लेकिन अब तक समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं हो सका.

याचिका में बताया गया है कि चेरीताल, जयप्रकाश नगर, तुलसी नगर सहित शहर के कई घनी आबादी वाले इलाके इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित हैं. कई बार इन क्षेत्रों में पर्याप्त पेयजल आपूर्ति नहीं हो पाती और जब पानी आता भी है तो नलों से मटमैला, बदबूदार और नालियों से रिसकर आया संक्रमित पानी निकलता है. मजबूरी में लोग उसी पानी को छानकर या उबालकर पीने को विवश हैं, इसके बावजूद पेट संबंधी संक्रमण, पीलिया, डायरिया और त्वचा रोगों का खतरा लगातार बना हुआ है.

अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता ने याचिका में यह भी रेखांकित किया है कि बरसात के मौसम में हालात और अधिक भयावह हो जाते हैं. शहर के कई हिस्सों में पानी की पाइपलाइनें नालियों और नालों के बीच से होकर गुजरती हैं, जहां वर्षों से लीकेज की समस्या बनी हुई है. गंदा नाली का पानी लीकेज के माध्यम से पेयजल पाइपलाइन में मिल जाता है और वही पानी घरों तक पहुंचता है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद इन लीकेज को स्थायी रूप से ठीक नहीं किया गया, जिससे हर साल बारिश के मौसम में स्थिति विकराल हो जाती है.

जनहित याचिका के समर्थन में वर्ष 2019 से 2026 तक प्रिंट मीडिया में प्रकाशित अनेक समाचारों की कतरनें भी संलग्न की गई हैं, जिनमें जबलपुर में गंदे पानी की आपूर्ति और उससे फैलने वाली बीमारियों को उजागर किया गया है. याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि जब मीडिया लगातार इस समस्या की ओर ध्यान दिला रहा है, तो स्थानीय स्वशासन संस्था नगर निगम जबलपुर अब तक क्यों नहीं जागी. बीते वर्षों में पेट और आंत से जुड़ी बीमारियों के कई मामले सामने आए हैं और हाल ही में ग्रामीण क्षेत्र निगड़ी में करीब 60 लोगों के बीमार पड़ने की घटना ने हालात की गंभीरता को और उजागर कर दिया है.

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि शहर के कई फिल्टर प्लांट या तो बंद पड़े हैं या उनकी क्षमता बेहद सीमित है. जलशुद्धिकरण की व्यवस्था दुरुस्त नहीं होने के कारण बिना पर्याप्त जांच के पानी सप्लाई किया जा रहा है. पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए कोई ठोस और नियमित मापदंड लागू नहीं किए गए हैं. नतीजतन दूषित पानी से होने वाले संक्रमण के कारण सरकारी और निजी अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई प्रभावी कदम उठाते नहीं दिख रहा.

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का ध्यान इस तथ्य की ओर भी आकृष्ट कराया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार प्राप्त है, जिसमें स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी शामिल है. इसके बावजूद जबलपुर जैसे बड़े शहर में नागरिकों को वर्षों से साफ पानी न मिल पाना सीधे तौर पर इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. इसी आधार पर हाईकोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप कर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे.

जनहित याचिका में यह मांग भी की गई है कि हाईकोर्ट एक उच्च स्तरीय स्वतंत्र कमेटी का गठन करे, जो पूरे जलापूर्ति तंत्र, फिल्टर प्लांट, पाइपलाइन नेटवर्क और जल गुणवत्ता जांच व्यवस्था की जांच करे. साथ ही यह कमेटी अदालत की निगरानी में समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस सिफारिशें दे. याचिकाकर्ता का कहना है कि केवल अस्थायी मरम्मत और आश्वासन से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है.

याचिका में नगर निगम की शिकायत निवारण व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. कहा गया है कि जबलपुर में 79 वार्ड होने के बावजूद गंदे पानी की शिकायत दर्ज कराने के लिए न तो कोई प्रभावी हेल्पलाइन है, न ही कोई ऑनलाइन पोर्टल और न ही 24 घंटे के भीतर समस्या के समाधान की कोई सुनिश्चित व्यवस्था. करोड़ों रुपये का बजट होने के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि जलापूर्ति सुधार के नाम पर आवंटित राशि वास्तव में कहां और कैसे खर्च की जा रही है.

जनहित याचिका दायर होने के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो गया है. बड़ी संख्या में नागरिक अपने-अपने इलाकों के नलों से निकल रहे गंदे पानी के वीडियो और तस्वीरें साझा कर प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं. आम लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो यह एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है.

 जबलपुर में दूषित पेयजल आपूर्ति का यह मामला अब प्रशासनिक लापरवाही से निकलकर न्यायिक जांच के दायरे में आ चुका है. हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका से शहरवासियों को उम्मीद जगी है कि वर्षों से चली आ रही इस गंभीर समस्या पर अब ठोस और निर्णायक कार्रवाई होगी और नागरिकों को उनके जीवन के मूल अधिकार के तहत स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-