अनिल मिश्र/पटना. बिहार के अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त बौद्ध महोत्सव को लेकर इस बार एक अहम और दूरगामी मांग सामने आई है। यह मांग केवल बोधगया तक सीमित आयोजन के दायरे को तोड़ते हुए गयाजी जिले के ग्रामीण अंचलों में फैली समृद्ध बौद्ध विरासत को भी बौद्ध महोत्सव से जोड़ने की है। सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु शेखर ने इस मुद्दे को लेकर जिला पदाधिकारी गयाजी, राज्य के पर्यटन सचिव और माननीय मुख्यमंत्री को आवेदन सौंपते हुए जिले की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक बौद्ध धरोहर को समग्र रूप से सामने लाने की अपील की है।
आवेदन में कहा गया है कि गयाजी जिला केवल बोधगया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान गौतम बुद्ध की तपोभूमि के रूप में व्यापक पहचान रखता है। जिले के ग्रामीण इलाकों में अनेक ऐसे बौद्ध स्थल हैं, जिनका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर का है, लेकिन वे अब तक उपेक्षा के शिकार रहे हैं। हिमांशु शेखर का कहना है कि बौद्ध महोत्सव का उद्देश्य केवल एक स्थान विशेष का प्रचार न होकर जिले भर में फैली बौद्ध विरासत को संरक्षण, विकास और वैश्विक पहचान दिलाना होना चाहिए, ताकि स्थानीय संस्कृति, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो सकें।
उन्होंने अपने आवेदन में यह भी उल्लेख किया है कि वर्ष 2024 में जिला प्रशासन द्वारा “पंचायत दर्शन” कार्यक्रम के तहत ग्रामीण बौद्ध स्थलों को जोड़ने की एक पहल की गई थी। इस योजना के तहत गांव-गांव में स्थित बौद्ध स्थलों को चिह्नित कर उन्हें पर्यटन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जोड़ने का प्रयास किया गया था। हालांकि पंचायत प्रतिनिधियों की उदासीनता और अपेक्षित सहयोग के अभाव में यह पहल सफल नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप वर्ष 2025 में इस योजना को स्थगित करना पड़ा, जिससे ग्रामीण बौद्ध स्थलों के विकास की उम्मीदों को गहरा झटका लगा।
आवेदन में सांसद आदर्श ग्राम केसपा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसे सनातन और बौद्ध दोनों ही परंपराओं की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान बुद्ध के प्रधान शिष्य महाकश्यप का आश्रम केसपा में स्थित था। यह क्षेत्र ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। यहां मां तारा देवी मंदिर, बुद्ध के पदचिन्ह, आदमकद बुद्ध प्रतिमा और कमल पुष्प के प्रतीक जैसे कई महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं, जो बौद्ध और सनातन परंपराओं के समन्वय का प्रतीक हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 1992 में देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने केसपा स्थित मां तारा देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की थी, जिससे इस क्षेत्र की ऐतिहासिक महत्ता और भी बढ़ जाती है।
हिमांशु शेखर का कहना है कि यदि केसपा जैसे स्थलों को बौद्ध महोत्सव से जोड़ा जाए तो न केवल वहां की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बल मिलेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यटन आधारित विकास को भी नई दिशा मिल सकती है। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि स्वयंसेवी संस्थाओं, बौद्ध धर्म प्रचारकों, स्थानीय विद्वानों और पंचायत प्रतिनिधियों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित की जाए, ताकि गयाजी जिले के सभी ग्रामीण बौद्ध स्थलों को बौद्ध महोत्सव, बोधगया से प्रभावी रूप से जोड़ा जा सके।
अपने आवेदन में उन्होंने बौद्ध महोत्सव की तिथियों को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई है। हिमांशु शेखर ने कहा है कि बौद्ध महोत्सव का आयोजन 22 जनवरी से 24 जनवरी तक प्रस्तावित है, लेकिन 23 जनवरी को सरस्वती पूजा होने के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी इस महोत्सव में शामिल नहीं हो सकेंगे। उनका तर्क है कि बौद्ध महोत्सव जैसे सांस्कृतिक और शैक्षणिक महत्व वाले आयोजन में विद्यार्थियों की भागीदारी बेहद जरूरी होती है, क्योंकि यही वर्ग बौद्ध दर्शन, अहिंसा और शांति के संदेश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसी कारण उन्होंने सुझाव दिया है कि बौद्ध महोत्सव का आयोजन गणतंत्र दिवस के बाद किया जाना अधिक उपयुक्त होता।
इस मांग के पीछे यह भावना भी स्पष्ट रूप से झलकती है कि बौद्ध महोत्सव को केवल एक औपचारिक या पर्यटन केंद्रित कार्यक्रम न बनाकर उसे बौद्ध विरासत के संरक्षण और प्रसार का सशक्त माध्यम बनाया जाए। ग्रामीण बौद्ध स्थलों को जोड़ने से जहां एक ओर बोधगया पर बढ़ते पर्यटन दबाव को संतुलित किया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर गयाजी जिले के दूर-दराज के क्षेत्रों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का अवसर मिलेगा।
बौद्ध धर्मावलंबियों और सामाजिक संगठनों के बीच यह मांग अब चर्चा का विषय बनती जा रही है। उनका मानना है कि यदि समय रहते इस पर सकारात्मक निर्णय लिया गया
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

