मुंबई. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के एक बयान ने देश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है. ओवैसी ने कहा है कि भले ही वे उस दिन को देखने के लिए जीवित न हों, लेकिन भविष्य में एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब हिजाब पहनने वाली महिला भारत की प्रधानमंत्री बनेगी. उन्होंने यह टिप्पणी भारत के संविधान का हवाला देते हुए की और कहा कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से आते हों. ओवैसी के इस बयान पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे गैरजिम्मेदाराना करार देते हुए उन पर आधा सच पेश करने का आरोप लगाया है.
ओवैसी ने अपने बयान में कहा कि भारत एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां संविधान की सर्वोच्चता है और यहां किसी पद पर पहुंचने के लिए धर्म या पहनावे को बाधा नहीं बनाया जाना चाहिए. उन्होंने पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शीर्ष संवैधानिक पदों पर केवल एक धर्म के लोगों के बैठने की अनुमति है, जबकि भारत में ऐसा नहीं है. उनके मुताबिक यही भारत की लोकतांत्रिक ताकत है कि यहां कोई भी नागरिक, चाहे वह किसी भी समुदाय से हो और किसी भी तरह का पहनावा अपनाता हो, देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है.
ओवैसी के इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया. भाजपा सांसद अनिल बोंडे ने ओवैसी के बयान को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि वे इस तरह के बयान देकर समाज को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं. बोंडे ने आरोप लगाया कि ओवैसी आधा सच पेश कर रहे हैं, क्योंकि मुस्लिम समाज के भीतर ही बड़ी संख्या में महिलाएं हिजाब जैसी प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठा रही हैं. उनका कहना था कि ओवैसी इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए उठा रहे हैं और इसे महिला सशक्तिकरण से जोड़ना गलत है.
भाजपा नेताओं का तर्क है कि भारत में किसी भी नागरिक को प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोकता, लेकिन इस तरह के बयानों से धर्म और पहनावे को राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का पद योग्यता, जनसमर्थन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय होता है, न कि किसी विशेष धार्मिक प्रतीक से. भाजपा का आरोप है कि ओवैसी इस तरह की टिप्पणियों के जरिए समाज में विभाजन की रेखा खींचना चाहते हैं.
दूसरी ओर, ओवैसी समर्थकों का कहना है कि उनके बयान को गलत संदर्भ में लिया जा रहा है. उनके अनुसार, ओवैसी का आशय किसी धार्मिक एजेंडे को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि यह बताना था कि भारत का संविधान सभी को समान अवसर देता है. समर्थकों का तर्क है कि हिजाब पहनने वाली महिला का प्रधानमंत्री बनना इस बात का प्रतीक होगा कि देश में विविधता को स्वीकार किया जाता है और किसी की पहचान या पहनावा उसके अधिकारों में बाधा नहीं बनता.
यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में धर्म, पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर बहसें लगातार तेज होती जा रही हैं. खासकर महिलाओं के पहनावे, धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों को लेकर समाज में अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं. हिजाब को लेकर पहले भी कई राज्यों और संस्थानों में विवाद हो चुके हैं, जहां इसे व्यक्तिगत आस्था और संवैधानिक अधिकारों से जोड़कर देखा गया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी का यह बयान केवल एक भविष्यवाणी या विचार व्यक्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में पहचान की राजनीति को और तेज कर सकता है. उनका कहना है कि ऐसे बयान जहां एक ओर संविधान की समावेशी भावना की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा दे सकते हैं. भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया इसी आशंका को दर्शाती है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बन सकता है.
महिला अधिकारों से जुड़े कुछ संगठनों ने भी इस बयान पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है. कुछ का कहना है कि किसी महिला का प्रधानमंत्री बनना उसकी योग्यता और नेतृत्व क्षमता का परिणाम होना चाहिए, न कि उसके पहनावे का. वहीं कुछ अन्य संगठनों का मानना है कि यदि कोई महिला अपनी आस्था के अनुसार हिजाब पहनते हुए भी देश का नेतृत्व कर सकती है, तो यह वास्तव में समानता और स्वतंत्रता का मजबूत उदाहरण होगा.
ओवैसी ने यह भी कहा कि उनका बयान किसी एक समुदाय को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की ताकत को रेखांकित करने के लिए था. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की खूबी यही है कि यहां हर नागरिक को सपने देखने और उन्हें साकार करने का अधिकार है. उनके अनुसार, अगर भविष्य में कोई महिला हिजाब पहनते हुए प्रधानमंत्री बनती है, तो यह संविधान की जीत होगी.
भाजपा नेताओं ने हालांकि इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ओवैसी बार-बार ऐसे बयान देते हैं जो समाज में भ्रम और विवाद पैदा करते हैं. उनका कहना है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर बात होनी चाहिए, न कि ऐसे विषयों पर जो लोगों को बांटते हैं.
ओवैसी के एक बयान ने एक बार फिर देश में धर्म, पहचान और राजनीति के रिश्ते पर बहस छेड़ दी है. यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होगी. सवाल यह नहीं है कि हिजाब पहनने वाली महिला प्रधानमंत्री बन सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत की राजनीति भविष्य में ऐसे मुद्दों से ऊपर उठकर समावेशी और विकास केंद्रित बहस की ओर बढ़ पाएगी या नहीं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

