-सुल्तान अहमद
“मेरी ग्रेजुएशन की पहली साल में शादी हो गई, लेकिन पढ़ाई जारी रखी। पति और ससुराल का सहयोग था, पर सहयोग ही जीवन की सुरक्षा नहीं बनता।”
उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ की एक महिला गारमेंट मज़दूर के ये शब्द भारत के तेज़ी से बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की उस सच्चाई को उजागर करते हैं, जो चमकदार निर्यात आँकड़ों और कॉरपोरेट मुनाफ़ों के पीछे अक्सर छिपी रह जाती है। यह कहानी किसी एक महिला की नहीं, बल्कि उन लाखों श्रमिक महिलाओं की है, जिनकी मेहनत से देश का परिधान उद्योग चलता है, लेकिन जिनकी ज़िंदगी आज भी असुरक्षा और अनिश्चितता से जूझ रही है।
शादी के कुछ वर्षों बाद वह महिला माँ बनीं। पति को हथकरघा उद्योग में स्थायी रोज़गार नहीं मिल पाया। कई बार हालात ऐसे बने कि बच्चे के लिए दूध जुटाना भी मुश्किल हो गया। बढ़ती ज़िम्मेदारियों और सीमित अवसरों के बीच उन्होंने एक कठिन निर्णय लिया—अपने बच्चों को माँ के पास छोड़कर अकेले रोज़गार की तलाश में दिल्ली-एनसीआर आना। यह फैसला आर्थिक मजबूरी का परिणाम था, लेकिन इसकी कीमत भावनात्मक रूप से बेहद भारी थी।
फरीदाबाद पहुँचने के बाद उन्होंने छह महीने एक दोस्त के घर बिताए। बाद में उन्हें देश की बड़ी गारमेंट कंपनियों में शामिल शाही एक्सपोर्ट्स में काम मिला। शुरुआत में भारी मशीनों पर लगाया गया, लेकिन तय उत्पादन लक्ष्य पूरा न कर पाने के कारण नौकरी से हटा दिया गया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। तीन महीने का सिलाई प्रशिक्षण लेने के बाद वे दोबारा फैक्ट्री में दर्ज़ी के रूप में लौटीं। उस समय उनकी मासिक आय मात्र चार हज़ार रुपये थी। आज ग्यारह–बारह वर्षों की लगातार मेहनत के बाद उनकी आय पंद्रह हज़ार रुपये प्रतिमाह तक पहुँची है।
उनका कार्यदिवस नौ घंटे से अधिक का होता है और अक्सर सप्ताह में चौवन घंटे से भी ज़्यादा काम करना पड़ता है। भोजन के लिए सिर्फ़ आधे घंटे का अवकाश मिलता है। रोज़ाना तीन सौ कपड़ों के पीस सिलने का लक्ष्य, लगातार निगरानी और समय का दबाव उनके काम का हिस्सा है। पदोन्नति का विकल्प भी सामने आया, लेकिन शर्त थी कि रोज़ चार घंटे अतिरिक्त काम करना होगा, वह भी बिना संतोषजनक वेतन वृद्धि के। बच्चों की ज़िम्मेदारी के चलते उन्होंने इसे ठुकरा दिया। उनके लिए पदोन्नति का मतलब था परिवार और मातृत्व से समझौता।
करीब पाँच साल तक वह शहर में अकेली रहीं और महीने-दो महीने में एक बार ही बच्चों से मिल पाती थीं। जब बच्चा पाँच साल का हुआ तो उन्हें डर सताने लगा कि कहीं बच्चे उन्हें माँ के रूप में पहचानना ही न छोड़ दें। इस भावनात्मक दबाव के चलते उन्होंने बच्चों को अपने साथ शहर बुला लिया। बाद में उनके पति भी फरीदाबाद आ गए। आज दोनों फैक्ट्रियों में काम करते हैं। परिवार की कुल आय लगभग तीस हज़ार रुपये है और वे श्रमिक विहार जैसी बस्तियों में रहते हैं—ऐसी बस्तियाँ जो भारत की औद्योगिक प्रगति को अदृश्य रूप से सब्सिडी देती हैं।
उनकी आकांक्षाएँ साधारण हैं—शहर में अपना घर, निजी वाहन, बच्चों को अच्छे निजी स्कूलों में पढ़ाना, कभी ब्रांडेड सामान खरीद पाना और कभी-कभार बाहर खाना। ये कोई विलासिता नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की बुनियादी ज़रूरतें हैं। लेकिन जिन मज़दूरों से अपार मूल्य पैदा होता है, उनके लिए ये सपने आज भी दूर हैं।
काग़ज़ों पर भारत के श्रम क़ानून मज़दूरों को कई अधिकार देते हैं। कारख़ाना अधिनियम काम के घंटे और विश्राम का प्रावधान करता है। वेतन संहिता न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी देती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता पीएफ, ईएसआई और पेंशन का प्रावधान करती है। मातृत्व लाभ और बोनस भुगतान से जुड़े क़ानून भी मौजूद हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि ठेका प्रथा के ज़रिये इन अधिकारों से मज़दूरों को दूर रखा जाता है। तीन दिन से अधिक छुट्टी लेने पर नौकरी जाने का डर, अर्जित अवकाश और सामाजिक सुरक्षा से वंचना—यह सब एक सुनियोजित व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा श्रम संरक्षण की भावना के खिलाफ़ है। उनका कहना है कि नए श्रम क़ानून निरीक्षण व्यवस्था को कमजोर करते हैं और सामूहिक सौदेबाज़ी की ताक़त घटाते हैं। राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से यह अधिशेष मूल्य की खुली लूट है—मज़दूर जितना मूल्य पैदा करता है, उसे उसका बहुत छोटा हिस्सा मिलता है, जबकि मुनाफ़ा फैक्ट्री मालिकों, निर्यातकों और वैश्विक ब्रांडों के पास चला जाता है।
महिलाओं के लिए नाइट शिफ्ट की अनुमति को अक्सर सशक्तिकरण के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है। अधिकांश महिला मज़दूर इसे सुरक्षा, स्वास्थ्य और परिवार के लिए जोखिम मानती हैं। असुरक्षित यात्रा, बिगड़ता स्वास्थ्य और बच्चों से दूरी—ये कीमतें किसी भी विकास मॉडल की नैतिकता पर सवाल खड़े करती हैं।
भारत आज पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास उन हाथों तक पहुँचेगा जो उसे गढ़ते हैं। जब तक अधिशेष पूँजी का न्यायपूर्ण बँटवारा नहीं होगा, श्रम क़ानूनों को सख़्ती से लागू नहीं किया जाएगा और मज़दूरों को केवल उत्पादन का साधन नहीं बल्कि हिस्सेदार नहीं माना जाएगा, तब तक भारत की विकास कहानी अधूरी ही रहेगी। यह सहानुभूति का विषय नहीं है, यह अधिकार और न्याय का सवाल है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

