भारतीय ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली को व्यक्ति के जीवन का दर्पण माना गया है। कुंडली में ग्रहों की स्थिति, उनकी युति, दृष्टि और भावों के आपसी संबंध से बनने वाले योग व्यक्ति के सुख-दुख, स्वास्थ्य, धन, वैवाहिक जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा को गहराई से प्रभावित करते हैं। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि जहां शुभ योग जीवन में उन्नति और सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं, वहीं कुछ अशुभ या घातक योग ऐसे भी होते हैं, जो जीवन भर संघर्ष, पीड़ा और अस्थिरता का कारण बन सकते हैं। इन्हीं कारणों से जन्म कुंडली में बनने वाले दस प्रमुख घातक योगों और उनके निवारण को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है।
ज्योतिष के अनुसार किसी भी कुंडली में दो या उससे अधिक ग्रहों की युति, दृष्टि या भाव संबंध से योग का निर्माण होता है। ग्रह योगों को ज्योतिषीय फलादेश का आधार माना गया है। यदि ये योग अशुभ प्रकृति के हों तो व्यक्ति को शिक्षा, धन, स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन और मानसिक शांति के क्षेत्र में निरंतर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही समय पर इन योगों की पहचान और शास्त्रसम्मत उपाय अपनाने से उनके दुष्प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कुंडली में बनने वाले घातक योगों में चांडाल योग को अत्यंत अशुभ माना गया है। जब किसी भी भाव में बृहस्पति के साथ राहु या केतु का संबंध बनता है, तो यह योग बनता है। इसका प्रभाव व्यक्ति की शिक्षा, धन और चरित्र पर पड़ता है। ऐसे जातक कई बार अनुचित मार्ग पर चल पड़ते हैं और बुजुर्गों या गुरुजनों का सम्मान नहीं कर पाते। पेट और श्वास संबंधी रोगों की संभावना भी बनी रहती है। ज्योतिषाचार्य इसके निवारण के लिए उत्तम चरित्र, पीली वस्तुओं का दान, माथे पर केसर या चंदन का तिलक तथा गुरुवार का व्रत करने की सलाह देते हैं।
अल्पायु योग को जीवन के लिए अत्यंत संवेदनशील माना गया है। जब चंद्रमा पाप ग्रहों से युक्त होकर त्रिक स्थानों में स्थित हो या लग्नेश कमजोर होकर पाप ग्रहों की दृष्टि में आ जाए, तब यह योग बनता है। इस योग में जातक के जीवन पर सदैव संकट मंडराता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे लोगों को खानपान और व्यवहार में विशेष सावधानी रखनी चाहिए। नियमित हनुमान चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ तथा बुरे कार्यों से दूरी इसके प्रमुख उपाय बताए गए हैं।
ग्रहण योग भी अत्यंत प्रभावशाली अशुभ योग माना गया है। चंद्रमा के साथ राहु या केतु की युति से चंद्रग्रहण और सूर्य के साथ राहु की युति से सूर्यग्रहण योग बनता है। चंद्रग्रहण से मानसिक पीड़ा और माता को कष्ट होता है, जबकि सूर्यग्रहण से जीवन में अस्थिरता, हड्डियों की कमजोरी और पिता से सुख में कमी देखी जाती है। इसके निवारण के लिए सूर्य को जल अर्पण, आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ और विशेष दान-व्रत बताए गए हैं।
वैधव्य योग विशेष रूप से वैवाहिक जीवन से जुड़ा हुआ है। यह योग बनने पर विवाह में बाधा, दांपत्य जीवन में तनाव या जीवनसाथी को कष्ट की आशंका बढ़ जाती है। ज्योतिष शास्त्र में इसके कई कारण बताए गए हैं, जैसे सप्तम भाव या सप्तमेश का मंगल और शनि से पीड़ित होना। इसके लिए विवाह पूर्व विशेष पूजन, कुंभ विवाह और विवाह के बाद मंगल-शनि के उपाय करने की परंपरा बताई जाती है।
दारिद्रय योग को आर्थिक दृष्टि से अत्यंत कष्टकारी माना गया है। यदि ग्यारहवें भाव का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में चला जाए, तो यह योग बनता है। ऐसे जातकों को जीवन में बार-बार आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है और मेहनत के बावजूद स्थिर धन संचय नहीं हो पाता।
षड्यंत्र योग व्यक्ति को अपने ही करीबी लोगों के षड्यंत्र का शिकार बना सकता है। लग्नेश का आठवें भाव में होना और शुभ ग्रहों का अभाव इस योग का कारण माना गया है। इससे मान-सम्मान और संपत्ति को नुकसान हो सकता है। इसके शमन के लिए शिव और हनुमान उपासना को प्रभावी बताया गया है।
कुज योग या मांगलिक दोष को लेकर समाज में पहले से ही जागरूकता देखी जाती है। मंगल का लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में होना इस योग का कारण है। इससे वैवाहिक जीवन में तनाव और टकराव की संभावना रहती है। विवाह से पूर्व कुंडली मिलान और विवाह के बाद विशेष पूजा-पाठ इसके सामान्य उपाय माने जाते हैं।
केमद्रुम योग को जीवनभर संघर्ष देने वाला योग माना गया है। चंद्रमा के आगे-पीछे ग्रहों का अभाव इस योग का निर्माण करता है। धन की कमी, रोग और वैवाहिक कठिनाइयां इसके प्रमुख परिणाम बताए गए हैं। शुक्रवार को लक्ष्मी-गणेश पूजन और चंद्र से संबंधित दान इसके उपायों में शामिल हैं।
अंगारक योग मंगल और राहु या केतु के संबंध से बनता है। इससे व्यक्ति का स्वभाव उग्र और हिंसक हो सकता है तथा पारिवारिक और सामाजिक संबंध बिगड़ते हैं। हनुमान उपासना और मंगलवार के दान इसके लिए सुझाए जाते हैं।
विष योग शनि और चंद्र के संबंध से बनता है और इसे अत्यंत कष्टकारी माना गया है। इससे जीवनभर विष के समान कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शनिवार को छाया दान, सोमवार को शिव उपासना और महामृत्युंजय मंत्र का जाप इसके प्रमुख उपाय बताए गए हैं।
ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि इन योगों से भयभीत होने के बजाय सही जानकारी और उपाय अपनाना अधिक आवश्यक है। जन्म कुंडली में अशुभ योग होने के बावजूद यदि व्यक्ति सदाचार, संयम और नियमित साधना अपनाता है, तो ग्रहों के दुष्प्रभाव काफी हद तक कम हो सकते हैं। यही कारण है कि आज भी ज्योतिष शास्त्र में योगों के साथ-साथ उनके निवारण को उतना ही महत्व दिया गया है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-



