रामचरितमानस की चौपाइयों का दिव्य प्रभाव और जीवन में उनका प्रयोग

रामचरितमानस की चौपाइयों का दिव्य प्रभाव और जीवन में उनका प्रयोग

प्रेषित समय :22:19:54 PM / Fri, Jan 16th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

रामचरितमानस केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, आस्था और आत्मिक शक्ति का अमूल्य ग्रंथ है. गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित इसकी प्रत्येक चौपाई में ऐसी आध्यात्मिक ऊर्जा निहित है, जो मनुष्य के जीवन के हर संकट, दुख, भय और भ्रम को दूर करने की क्षमता रखती है.

शास्त्रों और संत परंपरा में यह माना गया है कि श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक रामचरितमानस की चौपाइयों का जप करने से न केवल मानसिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि जीवन की व्यावहारिक समस्याओं—जैसे रोग, शोक, भय, दरिद्रता, विघ्न, वैर, मोह और असफलता—से भी मुक्ति मिलती है.

ये चौपाइयाँ मंत्र स्वरूप हैं. इनका प्रभाव शब्दों से नहीं, बल्कि भाव, विश्वास और निरंतरता से प्रकट होता है. यदि मनुष्य अपने जीवन में नियमित रूप से इनका स्मरण और जप करे, तो प्रभु श्रीराम की कृपा से जीवन में सुख, शांति, सद्बुद्धि और समृद्धि का संचार होता है.
प्रभु श्रीराम आपके जीवन को मंगलमय, संकटमुक्त और आनंदपूर्ण बनाएँ—यही इस संकलन का उद्देश्य है.

1. सर्वांगीण रक्षा और भयमुक्त जीवन के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक.
घृत वर चाप रुचिर कर सायक॥

2. विपत्ति, आपदा और संकटों से मुक्ति के लिए
राजीव नयन धरे धनु सायक.
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक॥

3. कठिन समय में दैवी सहायता प्राप्त करने के लिए
मोरे हित हरि सम नहीं कोऊ.
एहि अवसर सहाय सोई होऊ॥

4. सभी कार्यों में सफलता और सिद्धि प्राप्त करने के लिए
वंदौं बाल रूप सोई रामू.
सब सिद्धि सुलभ जपत जोहि नामू॥

5. मन, परिस्थिति और संबंधों को वश में करने के लिए
सुमिर पवनसुत पावन नामू.
अपने वश कर राखे रामू॥

6. भारी संकट, भय और विपदा से रक्षा के लिए
दीन दयालु विरद संभारी.
हरहु नाथ मम संकट भारी॥

7. जीवन के सभी विघ्न और बाधाओं के नाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहिं नहीं तेही.
राम सुकृपा बिलोकहिं जेही॥

8. रोग, व्याधि और शारीरिक कष्टों के निवारण के लिए
राम कृपा नाशहिं सब रोगा.
जो यहि भांति बनहिं संयोगा॥

9. ज्वर, ताप और मानसिक अशांति दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भौतिक तापा.
राम राज्य नहिं काहुहि व्यापा॥

10. जीवन के समस्त दुःखों के पूर्ण नाश के लिए
राम भक्ति मणि उर बस जाके.
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके॥

11. खोई हुई वस्तु या अवसर पुनः प्राप्त करने के लिए
गई बहोरि गरीब निवाजू.
सरल सबल साहिब रघुराजू॥

12. प्रेम, अनुराग और आत्मीयता बढ़ाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे.
अनुदिन बढ़े अनुग्रह तोरे॥

13. घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाने के लिए
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं.
सुख संपत्ति नाना विधि पावहिं॥

14. आत्म-सुधार, दोष निवारण और सद्गुण विकास के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती.
जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥

15. विद्या, ज्ञान और बौद्धिक विकास के लिए
गुरु गृह पढ़न गए रघुराई.
अल्प काल विद्या सब आई॥

16. वाणी में सरस्वती वास और रचनात्मकता के लिए
जेहि पर कृपा करहिं जन जानी.
कवि उर अजिर नचावहिं बानी॥

17. निर्मल बुद्धि, विवेक और सद्बुद्धि प्राप्त करने के लिए
ताके युग पद कमल मनाऊँ.
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ॥

18. मोह, भ्रम और आसक्ति के नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा.
तब रघुनाथ चरण अनुरागा॥

19. समाज और संबंधों में आपसी प्रेम बढ़ाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती.
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति रीती॥

20. वैर समाप्त कर प्रेम और सौहार्द बढ़ाने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई.
जासु बैर प्रीति कर सोई॥

21. दांपत्य एवं पारिवारिक सुख की प्राप्ति के लिए
अनुज सहित भोजन करहीं.
देखि सकल जननी सुख भरहीं॥

22. भाइयों में प्रेम, एकता और सौहार्द के लिए
सेवहिं सानुकूल सब भाई.
राम चरण रति अति अधिकाई॥

23. शत्रुता और द्वेष भाव दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई.
राम प्रताप विषमता खोई॥

24. बिगड़े संबंधों में मेल-मिलाप कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करहिं मिलाई.
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

25. शत्रु बाधा और विरोध से रक्षा के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा.
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा॥

26. रोजगार, आजीविका और आर्थिक स्थिरता के लिए
विश्व भरण पोषण कर जोई.
ताकर नाम भरत अस होई॥

27. मनोकामना और इच्छापूर्ति के लिए
राम सदा सेवक रुचि राखी.
वेद पुराण साधु सुर साखी॥

28. पाप, दोष और नकारात्मक कर्मों के नाश के लिए
पापी जाके नाम सुमिरहीं.
अति अपार भव सागर तरहीं॥

29. अकाल मृत्यु भय और असमय कष्ट से रक्षा के लिए
अल्प मृत्यु नहिं कबहुँ पीरा.
सब सुंदर सब निरुज शरीरा॥

30. दरिद्रता दूर कर समृद्धि प्राप्त करने के लिए
नहिं दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना.
नहिं कोऊ अबुध न लच्छन हीना॥

31. प्रभु श्रीराम के साक्षात दर्शन और अनुभूति के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा.
प्रकटे हृदय हरन भव पीरा॥

32. शोक, संताप और मानसिक पीड़ा दूर करने के लिए
नयन बंत रघुपतहिं बिलोकि.
आए जन्म फल होहिं विशोकी॥

33. अपराध-बोध से मुक्त होकर क्षमा याचना के लिए
अनुचित बहुत कहहुँ अज्ञाता.
क्षमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता॥

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-