न्यायिक सुधार के नाम पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख एक साल में फैसला अनिवार्य करने वाली जनहित याचिका खारिज

न्यायिक सुधार के नाम पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख एक साल में फैसला अनिवार्य करने वाली जनहित याचिका खारिज

प्रेषित समय :17:04:15 PM / Mon, Jan 19th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली.  न्यायिक सुधारों के नाम पर दायर एक जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कड़ी टिप्पणी के साथ खारिज कर दिया. अदालत ने इस याचिका को ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ करार देते हुए कहा कि न्यायालय को कैमरों के सामने बयानबाज़ी का मंच नहीं बनाया जा सकता. याचिकाकर्ता ने देश की हर अदालत के लिए यह अनिवार्य करने की मांग की थी कि प्रत्येक मुकदमे का निपटारा एक वर्ष की समय-सीमा में किया जाए. शीर्ष अदालत ने इस मांग को अव्यावहारिक बताते हुए स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया को किसी एक कठोर फ़ॉर्मूले में नहीं बांधा जा सकता.

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि देश की न्यायिक व्यवस्था की जटिलता, मामलों की प्रकृति, साक्ष्यों की मात्रा, पक्षकारों की संख्या और कानूनी प्रश्नों की गंभीरता जैसे अनेक कारक किसी भी मुकदमे की अवधि तय करते हैं. ऐसे में एक समान समय-सीमा तय करना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यवहारिक. अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि न्याय में देरी निश्चित रूप से एक गंभीर समस्या है, लेकिन उसका समाधान नारेबाजी या सुर्ख़ियों में आने वाली याचिकाओं से नहीं, बल्कि संरचनात्मक सुधारों और संस्थागत प्रयासों से संभव है.

पीठ ने याचिका की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनहित याचिका का उद्देश्य वास्तविक सार्वजनिक हित होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत प्रचार. अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह की याचिकाएं न केवल न्यायालय का समय लेती हैं, बल्कि उन मामलों की सुनवाई में भी बाधा बनती हैं जिनमें वास्तव में न्यायिक हस्तक्षेप की ज़रूरत होती है. न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि जनहित याचिका की आड़ में न्यायपालिका पर दबाव बनाने या लोकप्रिय मांगों के सहारे आदेश हासिल करने की प्रवृत्ति पर सख़्ती से अंकुश लगाया जाना चाहिए.

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने से आम नागरिकों का न्याय प्रणाली से भरोसा उठ रहा है और एक निश्चित समय-सीमा तय किए बिना स्थिति में सुधार संभव नहीं. इस पर अदालत ने कहा कि लंबित मामलों की समस्या से न्यायपालिका भली-भांति अवगत है और इस दिशा में पहले से कई प्रशासनिक और तकनीकी कदम उठाए जा चुके हैं. ई-कोर्ट्स परियोजना, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग, केस मैनेजमेंट सिस्टम और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसी व्यवस्थाएं इसी प्रयास का हिस्सा हैं.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक सुधारों का मार्ग विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—तीनों के समन्वय से होकर जाता है. केवल न्यायालयों पर समय-सीमा थोप देना समाधान नहीं हो सकता, विशेषकर तब जब जजों की कमी, बुनियादी ढांचे की सीमाएं और मुकदमों की बढ़ती संख्या जैसी वास्तविक चुनौतियां मौजूद हों. पीठ ने कहा कि न्याय की गुणवत्ता को समय-सीमा की जल्दबाज़ी में बलि नहीं चढ़ाया जा सकता.

सुनवाई के दौरान न्यायालय का यह भी कहना था कि हर मामला एक जैसा नहीं होता. कुछ मामलों में त्वरित निर्णय आवश्यक होता है, जबकि कुछ मामलों में विस्तृत सुनवाई और गहन विचार-विमर्श अनिवार्य होता है. एक वर्ष की बाध्यकारी सीमा से न केवल न्यायिक विवेक प्रभावित होगा, बल्कि गलतियों की संभावना भी बढ़ेगी, जिसका खामियाजा अंततः नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है.

शीर्ष अदालत ने जनहित याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर भी चिंता जताई और कहा कि यह असाधारण उपाय है, जिसे असाधारण परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए. अदालत ने दोहराया कि जनहित याचिका की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है जब इसे वास्तविक सामाजिक सरोकारों तक सीमित रखा जाए. प्रचार या व्यक्तिगत एजेंडे से प्रेरित याचिकाएं इस व्यवस्था की आत्मा को नुकसान पहुंचाती हैं.

याचिका खारिज करते हुए अदालत ने यह संदेश भी दिया कि न्यायिक सुधारों पर गंभीर विमर्श का स्वागत है, लेकिन उसका मंच और तरीका उचित होना चाहिए. न्यायालय ने संकेत दिया कि नीति-निर्माण से जुड़े ऐसे व्यापक प्रश्नों पर संसद और संबंधित संस्थानों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है. अदालत ने कहा कि वह संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर ही हस्तक्षेप कर सकती है.

इस फ़ैसले को न्यायिक व्यवस्था के भीतर अनुशासन और संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर रोक लगाने में सहायक होगा और वास्तविक मामलों को प्राथमिकता देने में मदद करेगा. साथ ही, यह फ़ैसला यह भी रेखांकित करता है कि सुधार की मांग और सुधार का रास्ता—दोनों में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता आवश्यक है.

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक सुधार कोई त्वरित नुस्ख़ा नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें ठोस योजना, संसाधनों की उपलब्धता और संस्थागत सहयोग की ज़रूरत होती है. अदालत ने जनहित के नाम पर दायर ऐसी याचिकाओं को ख़ारिज कर यह संदेश दिया कि न्यायपालिका की गरिमा और कार्यप्रणाली को सुर्ख़ियों की राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-