ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 20 जनवरी 2026, मंगलवार को दोपहर 12 बजकर 13 मिनट पर कर्मफल प्रदाता और न्यायाधीश कहे जाने वाले शनि देव अपने ही नक्षत्र उत्तरा भाद्रपद में प्रवेश करने जा रहे हैं. यह खगोलीय और ज्योतिषीय घटना लगभग 27 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद घटित हो रही है, जिसे लेकर ज्योतिष जगत में व्यापक चर्चा और विश्लेषण आरंभ हो गया है. इस गोचर को विशेष इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र पूर्णतः मीन राशि में स्थित है, जिसका राशि स्वामी गुरु (बृहस्पति) है, जबकि नक्षत्र स्वामी स्वयं शनि हैं. इस प्रकार गुरु और शनि के सिद्धांतों का यह संयोग जीवन, कर्म और चेतना के स्तर पर गहरे प्रभाव उत्पन्न करने वाला माना जा रहा है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि का संबंध मनुष्य के कर्म, अनुशासन, न्याय, संघर्ष और दीर्घकालिक फल से होता है, जबकि चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक संतुलन का कारक है. इसी संदर्भ में शनि और चंद्र की युति से बनने वाले विषयोग को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की जाती है. सामान्यतः साढ़ेसाती और ढैया जैसे योग शनि के गोचर के समय सक्रिय होते हैं, जब शनि चंद्र राशि से आगे-पीछे अथवा चतुर्थ और अष्टम भाव में गोचर करता है. ऐसे समय में शनि की तथाकथित विषाक्त किरणें चंद्रमा को प्रभावित करती हैं, जिससे जातक मानसिक अशांति, निर्णय क्षमता में कमी और कार्यों में निरंतर बाधा का अनुभव करता है.
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जब मन और मस्तिष्क तनावग्रस्त होते हैं, तब व्यक्ति के निर्णय भी असंतुलित हो जाते हैं और उसका प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देने लगता है. किंतु यदि यही शनि-चंद्र युति जन्मकुंडली में ही मौजूद हो, तो स्थिति और अधिक गंभीर मानी जाती है. इसे विषयोग कहा जाता है, जो जातक के मन-मस्तिष्क में स्थायी असंतोष, कुंठा और मानसिक दबाव के रूप में स्थापित हो जाता है. ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार ऐसा व्यक्ति जीवन भर साढ़ेसाती तुल्य पीड़ा से गुजरता है, चाहे गोचर में शनि की स्थिति अनुकूल ही क्यों न हो.
विशेषज्ञों का मानना है कि जन्मकुंडली में बना विषयोग सोच, विचार, वाणी, पारस्परिक संबंधों और समन्वय क्षमता को प्रभावित करता है. व्यक्ति भीतर ही भीतर संघर्ष करता रहता है और कई बार बिना स्पष्ट कारण के भी मानसिक थकान और अस्थिरता का अनुभव करता है. यदि इसी दौरान शनि का गोचर, ढैया या साढ़ेसाती भी चल रही हो, तो यह प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. ऐसे समय को ज्योतिष में मानसिक और कर्मिक परीक्षा का काल माना जाता है, जिसमें व्यक्ति को अपने ही विचारों और कर्मों से संघर्ष करना पड़ता है.
20 जनवरी 2026 से शनि देव उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश कर 17 मई 2026 तक वहीं स्थित रहेंगे. ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में शनि मध्यम फल प्रदान करते हैं. यह नक्षत्र व्यक्ति को मेहनती, ईमानदार, न्यायप्रिय और स्वाभिमानी बनाता है. हालांकि, यह फल सहजता से प्राप्त नहीं होते, बल्कि कठोर परिश्रम, संयम और अनुशासन की कसौटी पर खरे उतरने के बाद ही मिलते हैं.
ज्योतिषियों के अनुसार इस नक्षत्र में शनि का गोचर बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक परिवर्तन की ओर संकेत करता है. इसे आध्यात्मिक जागृति, ध्यान और उच्च ज्ञान की ओर बढ़ने का अवसर माना जा रहा है. शनि यहां व्यक्ति को रुककर अपने कर्मों का मूल्यांकन करने के लिए विवश करता है. जो लोग शॉर्टकट, अनैतिक साधनों या भ्रम के सहारे आगे बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए यह समय कठिन साबित हो सकता है, जबकि ईमानदारी और धैर्य से कार्य करने वालों को धीरे-धीरे स्थिर फल मिलने की संभावना जताई जा रही है.
शनि को कर्मफल प्रदाता कहा जाता है और उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही शनि अपने नियमों को और अधिक कठोर कर देते हैं, ऐसा ज्योतिषीय मत है. इस अवधि में व्यक्ति को उसके किए गए कर्मों का सीधा और स्पष्ट परिणाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है. यह गोचर लोगों को आत्मनिरीक्षण की ओर प्रेरित करेगा और यह समझने का अवसर देगा कि जीवन में जो भी चल रहा है, वह केवल परिस्थितियों का नहीं बल्कि स्वयं के कर्मों का परिणाम है.
ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि यह समय विशेष रूप से उन जातकों के लिए महत्वपूर्ण होगा, जिनकी कुंडली में पहले से शनि-चंद्र युति या अन्य मानसिक दबाव उत्पन्न करने वाले योग मौजूद हैं. ऐसे जातकों को इस अवधि में संयम, ध्यान और मानसिक संतुलन बनाए रखने पर विशेष ध्यान देना होगा. वहीं, गुरु और शनि के इस विशेष संयोग को कुछ विद्वान दीर्घकालिक दृष्टि से समाज में नैतिकता, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना के पुनर्स्थापन का संकेत भी मान रहे हैं.
कुल मिलाकर शनि का उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश केवल एक ग्रह गोचर नहीं, बल्कि मनुष्य के मन, कर्म और चेतना के स्तर पर होने वाले गहरे परिवर्तनों का सूचक माना जा रहा है. यह समय जहां एक ओर मानसिक दबाव और कर्मिक परीक्षा ला सकता है, वहीं दूसरी ओर आत्मिक विकास, अंतर्ज्ञान की वृद्धि और सही दिशा में आगे बढ़ने का अवसर भी प्रदान करेगा. ज्योतिष की भाषा में कहा जाए तो आने वाले महीनों में शनि हर व्यक्ति से यही प्रश्न पूछेंगे कि उसने अब तक अपने कर्मों के साथ कितना न्याय किया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

