भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में किसी भी मांगलिक कार्य के शुभारंभ से पूर्व 'प्रथम पूज्य' भगवान श्री गणेश का स्मरण अनिवार्य माना गया है लेकिन ज्योतिष शास्त्र और आगम ग्रंथों के अनुसार गणेश साधना केवल एक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन की समस्त बाधाओं को समूल नष्ट करने का एक अभेद्य आध्यात्मिक कवच है। आध्यात्मिक नगरी काशी से लेकर देशभर के प्रमुख वैदिक केंद्रों में इन दिनों गणेश साधना की प्राचीन विधियों और उनके वैज्ञानिक महत्व को लेकर विशेष विमर्श छिड़ा हुआ है क्योंकि वर्तमान कालखंड में जिस प्रकार मानसिक तनाव और अनिश्चितता बढ़ी है उसमें बुद्धि और विवेक के देवता गजानन की आराधना ही एकमात्र समाधान बनकर उभरी है। दैवज्ञों और साधना मर्मज्ञों का स्पष्ट मत है कि भगवान गणेश की साधना के लिए सामग्री से अधिक साधक की आंतरिक शुचिता और समर्पण का महत्व है जिसमें एक छोटी सी चौकी पर बिछा हुआ लाल वस्त्र और उस पर स्थापित गणेश प्रतिमा संपूर्ण ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने का केंद्र बन जाती है।
साधना की इस पावन यात्रा में सामग्री का चयन अत्यंत गूढ़ और अर्थपूर्ण है जिसमें सिंदूर को मंगल का प्रतीक और अक्षत को पूर्णता का सूचक माना गया है। विशेष रूप से गणेश जी को अर्पित की जाने वाली 21 दूर्वा केवल घास के तिनके नहीं हैं बल्कि वे जीवन में निरंतरता और शीतलता का संचार करने वाली औषधीय और आध्यात्मिक शक्तियां हैं। साधना के समय का निर्धारण करते हुए विद्वानों ने ब्रह्म मुहूर्त को सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि उस समय आकाश मंडल में सात्विक तरंगों का प्रवाह सर्वाधिक होता है जो साधक के संकल्प को सीधे ईश्वरीय चेतना से जोड़ता है। विशेषकर बुधवार या चतुर्थी तिथि को शुरू की गई साधना को अमोघ माना गया है क्योंकि इन दिनों में गणेश तत्व पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है। साधना की शुरुआत में हाथ में जल लेकर किया गया संकल्प साधक के लक्ष्य को स्पष्ट करता है कि वह यह तपस्या अपनी बुद्धि की प्रखरता के लिए कर रहा है या फिर परिवार की सुख-शांति और कार्यक्षेत्र की बाधाओं को दूर करने के लिए।
मंत्र विज्ञान की दृष्टि से 'ॐ वक्रतुण्डाय हुं' का जाप एक ऐसा परमाणु अस्त्र है जो न केवल बाहरी शत्रुओं बल्कि व्यक्ति के भीतर छिपे आलस्य, क्रोध और भ्रम जैसे आंतरिक शत्रुओं का भी नाश कर देता है। 108 बार किया गया यह मंत्र जप मस्तिष्क की कोशिकाओं में एक विशेष कंपन पैदा करता है जिससे निर्णय लेने की क्षमता में अभूतपूर्व सुधार होता है। साधना के दौरान मोदक या पीले लड्डुओं का भोग लगाना केवल मिष्ठान अर्पण नहीं है बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान का फल अंततः मीठा और आनंददायक होता है। साधना के नियमों में सात्विक भोजन और क्रोध के त्याग पर जो जोर दिया गया है वह वस्तुतः साधक की ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाने की एक प्रक्रिया है ताकि वह साधना के फल को आत्मसात कर सके। समापन के समय की जाने वाली क्षमा प्रार्थना मानव के अहंकार को शून्य करती है और उसे यह बोध कराती है कि ईश्वर की कृपा के बिना कोई भी कर्म पूर्ण नहीं है।
गणेश साधना की यह विधि आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रबंधन और एकाग्रता सीखने का एक उत्कृष्ट माध्यम भी है। जहां एक ओर भौतिकवाद की अंधी दौड़ में लोग दिशाहीन हो रहे हैं वहीं यह प्राचीन साधना विधि उन्हें मानसिक अनुशासन और धैर्य का पाठ पढ़ा रही है। मंदिरों में उमड़ती भीड़ और सामूहिक गणेश अथर्वशीर्ष के पाठ इस बात के गवाह हैं कि आधुनिकता के बावजूद लोग अपनी जड़ों और आध्यात्मिक संस्कारों की ओर लौट रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और नियम के साथ इस साधना को अपने जीवन का हिस्सा बनाता है तो उसे न केवल आर्थिक उन्नति प्राप्त होती है बल्कि उसका व्यक्तित्व भी कुंदन की भांति चमक उठता है। अंततः यह साधना हमें यह सिखाती है कि बाधाएं जीवन का अंत नहीं हैं बल्कि वे गणेश की कृपा से ऊंचे उठने की सीढ़ियां हैं बशर्ते हमारे पास सही दिशा और विधि हो।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

