बृहस्पति की महादशा का संपूर्ण ज्योतिषीय विश्लेषण, अंतर्दशाओं के शुभाशुभ प्रभाव

बृहस्पति की महादशा का संपूर्ण ज्योतिषीय विश्लेषण, अंतर्दशाओं के शुभाशुभ प्रभाव

प्रेषित समय :21:40:43 PM / Tue, Jan 20th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ब्रह्मांड के सबसे विशाल और शुभ माने जाने वाले ग्रह देवगुरु बृहस्पति की महादशा मानव जीवन के 16 वर्षों को किस प्रकार प्रभावित करती है और इस दौरान अन्य ग्रहों की अंतर्दशाएं कैसे भाग्य का कायाकल्प या संघर्ष की पटकथा लिखती हैं, इसे लेकर ज्योतिष विज्ञान के गहरे अनुभव और सिद्धांतों पर आधारित एक विस्तृत शोध रिपोर्ट सामने आई है. ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञों और अनुभवी दैवज्ञों के अनुसार गुरु की महादशा का फल केवल एक समान नहीं रहता बल्कि यह गुरु के साथ आने वाले अन्य ग्रहों के बल, उनकी स्थिति, दृष्टि और युति पर निर्भर करता है. गुरु की महादशा में जब स्वयं गुरु की अंतर्दशा आती है तो इसे व्यक्ति के आत्मोत्थान का काल माना गया है. यदि गुरु अपनी उच्च राशि, मूलत्रिकोण या केंद्र-त्रिकोण के स्वामियों के प्रभाव में हो तो जातक को समाज में असाधारण प्रतिष्ठा, मांगलिक कार्यों का सुख और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन प्राप्त होता है. इस अवधि में जातक के भीतर सात्विक गुणों का उदय होता है और वह आचार्यों व विद्वानों के सान्निध्य में अपनी मानसिक इच्छाओं की पूर्ति करता है. विशेषकर यदि गुरु कर्मेश या भाग्येश के प्रभाव में हो तो संतान सुख के साथ-साथ आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खुलते हैं, लेकिन इसके विपरीत यदि गुरु नीच राशि या दुःस्थानों में हो तो यही कालखंड मान-सम्मान की हानि और व्यापारिक घाटे का सबब बन जाता है.

परिवर्तन का एक बड़ा दौर तब शुरू होता है जब गुरु की उदारता के साथ शनि की अनुशासन प्रिय अंतर्दशा का मेल होता है. अनुभवी ज्योतिषियों का मानना है कि यदि इस कालखंड में ग्रह शुभ स्थिति में हों तो जातक को पश्चिम दिशा की यात्राओं से भारी लाभ, भूमि-भवन और वाहन का सुख मिलता है. वह अपने से उच्च पदस्थ लोगों के संपर्क में आकर करियर की नई ऊंचाइयों को छूता है. हालांकि शनि का नकारात्मक पक्ष तब उजागर होता है जब ग्रह नीच या शत्रु क्षेत्री हो जाएं. ऐसी स्थिति में जातक के भीतर गंभीर चारित्रिक गिरावट देखी जाती है. पुरुष जातकों में मद्यपान और अनैतिक कार्यों की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, वहीं स्त्री जातकों के जीवन में पारिवारिक बिखराव और बुजुर्गों के अपमान जैसी स्थितियां निर्मित होती हैं. यह समय नेत्र रोग, मानसिक कष्ट और आर्थिक तंगी का भी सूचक बन जाता है. इसी क्रम में बुध की अंतर्दशा एक ऐसा पड़ाव है जहाँ विद्वानों के मत विभाजित हैं. जहाँ एक पक्ष इसे अत्यंत शुभ मानता है, वहीं दूसरा पक्ष सावधानी बरतने की सलाह देता है. यदि बुध और गुरु का संबंध नवपंचम या केंद्र का हो तो व्यक्ति चुनाव या सभाओं के माध्यम से राजनीतिक सत्ता और सामाजिक सदस्यता प्राप्त करता है. उसे उच्च विद्या और संतान का सुख मिलता है, लेकिन षडाष्टक योग या नीच की स्थिति में यही बुध व्यक्ति की भाषा को दूषित कर देता है. वह अपशब्दों का प्रयोग करने लगता है और आर्थिक संकटों के साथ-साथ मद्यपान की ओर आकर्षित होकर समाज में अपनी छवि धूमिल कर लेता है.

गुरु में केतु की अंतर्दशा को मिश्रित फलों का कालखंड कहा गया है. यदि केतु शुभ भावों में हो तो व्यक्ति का झुकाव धर्म और अध्यात्म की ओर इतना बढ़ जाता है कि वह सन्यास तक का विचार करने लगता है. समाज में उसके अच्छे कार्यों की सराहना होती है, लेकिन पाप प्रभाव होने पर यही केतु शल्यक्रिया यानी सर्जरी का कारक बनता है. जातक को कारावास का भय और आर्थिक हानि का सामना करना पड़ सकता है. इसी प्रकार शुक्र की अंतर्दशा भी एक चुनौतीपूर्ण समय होता है क्योंकि गुरु और शुक्र परस्पर शत्रु माने जाते हैं. बावजूद इसके, यदि ग्रह उच्च के हों तो व्यक्ति तालाब, कुएं जैसे जनकल्याणकारी कार्य करवाता है और भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ रत्नाभूषण प्राप्त करता है. परंतु यदि शुक्र पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन से मन उचट जाता है और व्यक्ति घर के बाहर सुख की तलाश में भटकने लगता है. यह समय शारीरिक कष्ट और बंधन भय का भी प्रतीक माना गया है.

राजनीतिक और प्रशासनिक सफलता के दृष्टिकोण से गुरु में सूर्य की अंतर्दशा को स्वर्णिम काल माना जाता है. इस दौरान जातक को सरकारी नौकरी, उच्च पद, अचानक धन लाभ और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. सूर्य की ऊर्जा गुरु के ज्ञान के साथ मिलकर जातक को महानगरों में सर्वसुविधायुक्त निवास और पुत्र सुख प्रदान करती है. लेकिन यदि सूर्य पीड़ित हो तो यही समय सिरदर्द, घबराहट और आत्मसम्मान की भारी कमी का कारण बनता है. इसी के समांतर चंद्रमा की अंतर्दशा व्यक्ति के मन को प्रसन्नता से भर देती है. शुभ चंद्रमा व्यापार में उन्नति और यश दिलाता है, जबकि अशुभ स्थिति होने पर माता को कष्ट और स्थान परिवर्तन जैसी समस्याएं पैदा होती हैं.

साहस और पराक्रम के क्षेत्र में गुरु और मंगल की युति को अत्यंत फलदायी बताया गया है. मंगल की अंतर्दशा में जातक भूमि-भवन का लाभ और तीर्थयात्राएं करता है. उसके नए कार्यों से उसे ख्याति मिलती है. लेकिन इस कालखंड का एक स्याह पक्ष भी है; यदि मंगल पाप प्रभाव में हो तो भाई से विवाद, रक्त विकार और अचानक दुर्घटनाएं होने की संभावना बनी रहती है. अंत में राहु की अंतर्दशा का विश्लेषण करते हुए ज्योतिषियों ने स्पष्ट किया है कि राहु यदि तीसरे, छठे, दसवें या ग्यारहवें भाव में हो तो अचानक धन लाभ और विदेश यात्रा के योग बनते हैं. लेकिन यदि राहु षडाष्टक योग बनाए तो व्यक्ति को अग्नि भय, बिजली से खतरा और पद से च्युत होने जैसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं. कुल मिलाकर गुरु की महादशा का यह 16 वर्षीय सफर ग्रहों की बारीक गणना और उनकी स्थिति के आधार पर ही व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मारकेश और ग्रहों के बलाबल का सूक्ष्म अध्ययन अनिवार्य है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-