बर्फ़ और गर्मी के बीच मुक़ाबला तय जलवायु संकट के साये में 2026 विंटर ओलंपिक

बर्फ़ और गर्मी के बीच मुक़ाबला तय जलवायु संकट के साये में 2026 विंटर ओलंपिक

प्रेषित समय :19:51:38 PM / Wed, Jan 21st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. फरवरी 2026 में जब इटली के मिलान और कॉर्टीना द’आम्पेज़ो में विंटर ओलंपिक की शुरुआत होगी, तब मुकाबला सिर्फ़ दुनिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीटों के बीच नहीं होगा. असली टकराव बर्फ़ और बढ़ती गर्मी के बीच होगा. ताज़ा वैज्ञानिक अध्ययनों और जलवायु आंकड़ों से साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन अब विंटर ओलंपिक जैसी प्रतिष्ठित वैश्विक प्रतियोगिताओं की बुनियाद को भी चुनौती देने लगा है.

कॉर्टीना द’आम्पेज़ो, जिसने 1956 में भी विंटर ओलंपिक की मेज़बानी की थी, आज वैसा ठंडा नहीं रहा जैसा कभी हुआ करता था. बीते करीब सात दशकों में यहाँ फ़रवरी महीने का औसत तापमान लगभग 3.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है. कभी जहां फ़रवरी में औसत तापमान माइनस 7 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता था, वहीं अब यह शून्य के करीब पहुँच गया है. तापमान में इस बदलाव का सीधा असर बर्फ़ पर पड़ा है. शोध बताते हैं कि 1970 के दशक से 2019 के बीच यहाँ औसत बर्फ़ की गहराई करीब 15 सेंटीमीटर तक कम हो चुकी है.

बदलते हालात को देखते हुए 2026 के खेलों के लिए इटली को 30 लाख क्यूबिक यार्ड से ज़्यादा कृत्रिम बर्फ़ तैयार करनी पड़ेगी. ऊँचे आल्प्स में स्थित होने के बावजूद प्राकृतिक बर्फ़ पर भरोसा नहीं किया जा सकता. यह स्थिति न सिर्फ़ आयोजन की लागत बढ़ाती है, बल्कि खेलों की निष्पक्षता और खिलाड़ियों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है. विशेषज्ञों के मुताबिक जब तापमान पर्याप्त ठंडा नहीं होता, तो बर्फ़ ठीक से जम नहीं पाती, सतह गीली और असमान हो जाती है और खिलाड़ियों के चोटिल होने का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है.

यह संकट केवल इटली तक सीमित नहीं है. 1950 के बाद जिन 19 शहरों ने विंटर ओलंपिक की मेज़बानी की है, वे सभी आज पहले की तुलना में ज़्यादा गर्म हो चुके हैं. औसतन इन शहरों में तापमान करीब 2.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है. विंटर पैरालंपिक की स्थिति और भी चिंताजनक मानी जा रही है, क्योंकि ये खेल आमतौर पर मार्च में आयोजित होते हैं, जब मौसम अपेक्षाकृत और गर्म होता है. अनुमान है कि 2050 तक दुनिया के सिर्फ़ एक चौथाई संभावित मेज़बान शहर ही ऐसे रह जाएंगे, जहां पैरालंपिक खेलों के लिए भरोसेमंद बर्फ़ और अनुकूल तापमान उपलब्ध हो सकेगा.

हालिया अध्ययन यह भी चेतावनी देता है कि अगर मौजूदा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का रुझान जारी रहा, तो सदी के अंत तक विंटर पैरालंपिक जैसे आउटडोर खेल लगभग नामुमकिन हो सकते हैं. कभी जहां 90 प्रतिशत से अधिक संभावित मेज़बान शहर सुरक्षित माने जाते थे, वहीं आने वाले दशकों में यह संख्या तेज़ी से घटती जाएगी.

जलवायु परिवर्तन का असर खिलाड़ियों की तैयारी पर भी साफ़ दिखने लगा है. स्कीइंग और स्नोबोर्डिंग जैसे खेलों से जुड़े एथलीट अब “बर्फ़ की तलाश” में एक जगह से दूसरी जगह जाने को मजबूर हैं. अमेरिका और यूरोप में स्की सीज़न पहले ही छोटा हो चुका है. हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय स्की प्रतियोगिताएँ सिर्फ़ इसलिए रद्द करनी पड़ीं क्योंकि या तो बर्फ़ नहीं थी या तापमान बहुत ज़्यादा था.

आयोजक संस्थाएँ टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेलों की बात ज़रूर कर रही हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का दावा है कि 2030 से ओलंपिक खेल “क्लाइमेट पॉज़िटिव” होंगे. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर वैश्विक तापमान इसी रफ़्तार से बढ़ता रहा, तो केवल बेहतर प्रबंधन और तकनीकी उपाय इस संकट का समाधान नहीं कर पाएंगे.

2026 के विंटर ओलंपिक एक चेतावनी की तरह सामने खड़े हैं. यह आयोजन सिर्फ़ खेलों का उत्सव नहीं, बल्कि इस सवाल का आईना है कि क्या दुनिया जलवायु संकट को समय रहते गंभीरता से ले रही है या नहीं. अगर धरती यूँ ही गर्म होती रही, तो आने वाले वर्षों में शायद विंटर ओलंपिक का मतलब ही बदल जाए—बर्फ़ पर होने वाले खेल, बिना बर्फ़ के.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-