गंगा में बहाया लीटरों दूध और गरीब बच्ची को दुत्कार कर भगाया, वायरल वीडियो ने छिड़ी नई बहस

गंगा में बहाया लीटरों दूध और गरीब बच्ची को दुत्कार कर भगाया, वायरल वीडियो ने छिड़ी नई बहस

प्रेषित समय :22:16:04 PM / Fri, Jan 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भारत में धर्म और आस्था के केंद्र अक्सर अपनी भव्यता और परंपराओं के लिए जाने जाते हैं, लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने इन परंपराओं की नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 'दुग्धाभिषेक' जैसे सदियों पुराने हिंदू अनुष्ठान के दौरान फिल्माए गए इस वीडियो ने न केवल आस्था के स्वरूप पर बल्कि समाज की विशेषाधिकार प्राप्त मानसिकता और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी एक तीखी बहस छेड़ दी है। वीडियो में दिख रहे दृश्य इतने हृदयविदारक हैं कि इसने 'परमार्थ' और 'कर्म' की परिभाषा को फिर से परखने पर मजबूर कर दिया है। इंटरनेट पर लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ईश्वर को दूध चढ़ाने से पहले इंसानी संवेदनाओं की बलि देना सही है?

गंगा के घाट पर फिल्माए गए इस वायरल क्लिप में देखा जा सकता है कि एक श्रद्धालु बड़े ही भक्ति भाव से तांबे के कलश से लीटरों दूध पवित्र गंगा नदी में प्रवाहित कर रहा है। यह दृश्य तब और भी विचलित करने वाला हो जाता है जब कुछ छोटी बच्चियां, जिनके हाथों में खाली बर्तन हैं, उस बहते हुए दूध को इकट्ठा करने की कोशिश करती हैं। वे बच्चियां शायद उस दूध से अपनी और अपने परिवार की भूख मिटाना चाहती थीं। लेकिन दिल दहला देने वाला मोड़ तब आता है जब वह श्रद्धालु उन बच्चियों को पास आता देख अपनी जगह बदल लेता है। वह यह सुनिश्चित करता है कि दूध उन गरीब बच्चियों के बर्तनों में न गिरे, बल्कि सीधे नदी की धारा में बह जाए। उसने उन मासूमों को अपने से दूर धकेल दिया, जिससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या श्रद्धा का मार्ग मानवता के प्रति इतना कठोर हो सकता है?

सोशल मीडिया पर इस वीडियो के सामने आते ही प्रतिक्रियाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। नेटिजन्स के एक बड़े वर्ग ने इसे 'सफेद बर्बादी' और 'असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा' करार दिया है। आलोचकों का तर्क है कि हिंदू धर्म के मूल दर्शन में 'नर सेवा ही नारायण सेवा' बताई गई है, यानी भूखे को भोजन कराना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है। लोगों ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस देश में लाखों बच्चे कुपोषण और भूख का शिकार हैं, वहां भगवान के नाम पर लीटरों दूध नदी में बहाना और उसे किसी जरूरतमंद के काम न आने देना केवल प्रतीकात्मक भक्ति है, वास्तविक करुणा नहीं। कई यूजर्स ने इसे आध्यात्मिक अहंकार बताया है, जहां व्यक्ति अपने 'पुण्य' के संचय के लिए सामने खड़े साक्षात ईश्वर (गरीब बच्चे) को पहचानने में विफल रहता है।

वहीं दूसरी ओर, एक छोटा वर्ग उस श्रद्धालु के बचाव में भी खड़ा नजर आया। उनके अनुसार, धार्मिक आस्था एक व्यक्तिगत मामला है और किसी को भी दूसरे की श्रद्धा के तरीके को सामाजिक लेंस से जज नहीं करना चाहिए। समर्थकों का तर्क है कि 'दुग्धाभिषेक' समर्पण, शुद्धता और कृतज्ञता का प्रतीक है और इसका आध्यात्मिक उद्देश्य अलग होता है। उनके अनुसार, दूध को नदी में प्रवाहित करना गंगा मैया के प्रति सम्मान का हिस्सा है और इसे सामाजिक कार्य से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वे मानते हैं कि समाज की गरीबी दूर करना सरकार और संस्थाओं का काम है, न कि किसी श्रद्धालु के अनुष्ठान के बीच में बाधा बनकर उसे बदलना।

हालांकि, इस घटना ने मंदिरों और पवित्र स्थलों पर होने वाली चढ़ावे की बर्बादी पर फिर से ध्यान खींचा है। डिजिटल मीडिया विशेषज्ञों और समाज शास्त्रियों का मानना है कि आस्था और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन होना अनिवार्य है। कई प्रगतिशील विचारकों ने सुझाव दिया है कि धार्मिक स्थलों को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जहां अनुष्ठान के बाद अर्पित किए गए दूध या खाद्य सामग्री को स्वच्छ तरीके से जरूरतमंदों तक पहुंचाया जा सके। 'दुग्धाभिषेक' के इस वायरल वीडियो ने यह साबित कर दिया है कि आज का जागरूक भारत केवल प्रतीकों पर विश्वास नहीं करता, बल्कि वह उन प्रतीकों के पीछे छिपी मानवीय करुणा की भी तलाश करता है।

अंततः, यह बहस इस बुनियादी सवाल पर आकर टिक जाती है कि क्या ईश्वर केवल कर्मकांडों से प्रसन्न होते हैं या उन छोटे-छोटे मानवीय कार्यों से जो किसी के जीवन में बदलाव ला सकें? मनाली में बिकिनी डांस से लेकर गंगा घाट पर दूध के इस बहाव तक, सोशल मीडिया लगातार समाज के दो चेहरों को आमने-सामने खड़ा कर रहा है। गंगा में बहता वह दूध शायद नदी की धारा में विलीन हो गया, लेकिन उसने पीछे उन लाखों मासूमों के चेहरों पर एक सवालिया निशान छोड़ दिया है, जो आज भी समाज की इस 'आस्था' की कीमत अपनी भूख से चुका रहे हैं।

वीडियो देखें : https://twitter.com/i/status/2014185010857640310

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-