भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर जलवायु आपदाओं का मंडराया काला साया, अरबों के निवेश पर बीमा सुरक्षा का संकट

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर जलवायु आपदाओं का मंडराया काला साया, अरबों के निवेश पर बीमा सुरक्षा का संकट

प्रेषित समय :20:39:49 PM / Sat, Jan 24th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारत इस समय अपने बुनियादी ढांचे के इतिहास के सबसे आक्रामक और महत्वाकांक्षी विस्तार के दौर से गुजर रहा है जहाँ चारों ओर सड़कों, बंदरगाहों, सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं का जाल बिछाया जा रहा है लेकिन विकास की इस अंधी दौड़ के बीच एक ऐसा कड़वा सच सामने आया है जो भविष्य की नींव हिला सकता है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की ताजा रिपोर्ट 'क्लाइमेट रिस्क एंड इंश्योरेंस फॉर इंडियाज इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स' ने देश के नीति निर्माताओं और आर्थिक विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है क्योंकि इसमें स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि भारत की अरबों रुपये की परिसंपत्तियां जलवायु के झटकों के लिए तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट के मुख्य लेखक अनिरुद्ध भट्टाचार्य और उनकी टीम ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब देश में जलवायु आपदाएं अब अपवाद नहीं बल्कि एक नियमित घटना बन चुकी हैं। साल 2025 ने इस पैटर्न को और भी स्पष्टता से दुनिया के सामने रखा है जहाँ बाढ़, अत्यधिक वर्षा, चक्रवात और भूस्खलन जैसी घटनाएं अब मौसम के कैलेंडर पर कब्जा कर चुकी हैं। शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, हाईवे और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स जैसे भारी निवेश वाले क्षेत्रों को 'अत्यधिक उच्च' जोखिम की श्रेणी में रखा गया है जिसका सीधा अर्थ यह है कि कंक्रीट और स्टील के इन ढांचों के पास कुदरत के कहर से बचने की कोई पुख्ता आर्थिक ढाल मौजूद नहीं है।

इस अध्ययन के विश्लेषणात्मक निष्कर्ष बताते हैं कि साल 2000 के बाद से भारत ने प्राकृतिक आपदाओं के कारण 99 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान सहा है और केवल 2023 में ही यह आंकड़ा 12 अरब डॉलर के पार चला गया था जो पिछले एक दशक के औसत से कहीं ज्यादा है। रिपोर्ट का सबसे डरावना पहलू यह है कि भारत की कई बड़ी परियोजनाएं उन्हीं इलाकों में स्थित हैं जो जलवायु के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। ओडिशा का पारादीप पोर्ट हो या हिमाचल और उत्तराखंड की पहाड़ियों में चीरती हुई सुरंगें, इन सबमें देश का लगभग 2.95 लाख करोड़ रुपया लगा हुआ है लेकिन इन संपत्तियों का बीमा कवर इतना कमजोर है कि किसी बड़ी आपदा की स्थिति में इसका पूरा आर्थिक बोझ अंततः सरकारी खजाने और आम जनता की जेब पर ही पड़ेगा। बीमा उद्योग के दिग्गजों जैसे एसबीआई जनरल इंश्योरेंस और म्यूनिख री इंडिया के साथ की गई बातचीत से यह उभरकर सामने आया है कि जलवायु जोखिम अब उनके लिए एक 'कोर बिजनेस रिस्क' बन चुका है और मौजूदा रिस्क मॉडल बदलते मौसम के मिजाज को समझने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं। यह एक ऐसी खतरनाक स्थिति है जहाँ बीमा कंपनियां जोखिम की सही कीमत तय नहीं कर पा रही हैं और इसी वजह से सुरक्षा के नाम पर एक गहरा शून्य पैदा हो गया है।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में आज भी लगभग 91 प्रतिशत जलवायु नुकसान बिना किसी बीमा कवर के रह जाते हैं जो विकसित देशों की तुलना में एक भयावह आंकड़ा है। हालांकि भारत अभी पूरी तरह से 'अनइंश्योरबल' यानी बीमा के अयोग्य नहीं हुआ है लेकिन हिमालयी राज्यों के कुछ हिस्से उस सीमा के खतरनाक रूप से करीब पहुंच रहे हैं। अमेरिका के कैलिफोर्निया और फ्लोरिडा जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि अगर नुकसान 'निश्चित' हो गया तो बीमा कंपनियां इन इलाकों से अपने हाथ खींच लेंगी और तब विकास का पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। आरती खोसला और उनकी टीम ने सुझाव दिया है कि अब समय आ गया है जब इंफ्रास्ट्रक्चर की प्लानिंग में जलवायु सहनशीलता को डिजाइन और लोकेशन के स्तर पर ही शामिल करना होगा। बेहतर रिस्क मॉडलिंग और पैरामीट्रिक इंश्योरेंस जैसे नए उपकरणों का सहारा लेना अब एक विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी बन गया है। यदि भारत को अपने विकास के पहियों को निरंतर घुमाना है तो उसे कंक्रीट के साथ-साथ जलवायु सुरक्षा के आर्थिक तंत्र को भी उतना ही मजबूत करना होगा वरना भविष्य में होने वाली आपदाएं न केवल सड़कों और पुलों को बहा ले जाएंगी बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की कमर भी तोड़ देंगी।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-