सीजेआई सूर्यकांत बोले- न्याय में विलंब केवल इनकार नहीं बल्कि न्याय का पूर्ण विनाश, हाईकोर्ट ही असली प्रहरी

सीजेआई सूर्यकांत बोले- न्याय में विलंब केवल इनकार नहीं बल्कि न्याय का पूर्ण विनाश, हाईकोर्ट ही असली प्रहरी

प्रेषित समय :21:42:23 PM / Sat, Jan 24th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को न्यायपालिका के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती पर प्रहार करते हुए एक ऐसा बयान दिया है जो आने वाले समय में देश की कानूनी व्यवस्था की दिशा बदल सकता है। 'फली नरीमन मेमोरियल लेक्चर' के मंच से देश को संबोधित करते हुए सीजेआई ने अत्यंत कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि "न्याय में देरी केवल न्याय का इनकार नहीं है बल्कि यह न्याय का पूरी तरह विनाश है।" मुंबई बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित इस विशेष व्याख्यान में उन्होंने अनुच्छेद 226 की महत्ता पर जोर देते हुए हाई कोर्ट्स को लोकतंत्र का असली सजग प्रहरी बताया। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि जब एक छोटे किसान की जमीन हड़पी जा रही हो या किसी पात्र छात्र को गलत तरीके से दाखिले से वंचित किया जा रहा हो, तो न्याय की पहुंच अगर एक दशक की मुकदमेबाजी के बाद होती है, तो वह न्याय पूरी तरह अर्थहीन हो जाता है। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम गढ़ माना जाता है, लेकिन सीजेआई ने स्वीकार किया कि इसकी भौगोलिक और प्रक्रियात्मक जटिलताएं अक्सर एक आम नागरिक के लिए इसे एक 'डरावना अभयारण्य' बना देती हैं। आधिकारिक सूत्रों और कानूनी जानकारों के हवाले से यह माना जा रहा है कि मुख्य न्यायाधीश का यह रुख निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में लंबित करोड़ों मामलों के त्वरित निपटारे के लिए एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल का संकेत हो सकता है।

इस ऐतिहासिक संबोधन का विश्लेषणात्मक पहलू यह है कि सीजेआई सूर्यकांत ने न्यायपालिका को अपनी पुरानी 'रिएक्टिव' यानी प्रतिक्रियावादी छवि से बाहर निकलकर 'सुपरवाइजरी' भूमिका अपनाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अक्सर प्रशासनिक जल्दबाजी में लिए गए फैसलों से नागरिक के अधिकारों का हनन होता है और ऐसी स्थिति में हाई कोर्ट ही वह पहली दहलीज है जहां उसे तुरंत राहत मिल सकती है। सीजेआई ने अपने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के अनुभव को साझा करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने नशे की समस्या से निपटने के लिए केवल अल्पकालिक आदेश नहीं दिए, बल्कि प्रणालियों और संरचनाओं का निर्माण किया। हालांकि इस समय सुप्रीम कोर्ट में मामलों का बोझ कम करने के लिए कई योजनाओं पर चर्चा चल रही है, लेकिन विभागीय सूत्रों का दावा है कि सीजेआई अब सीधे तौर पर हाई कोर्ट्स की जवाबदेही तय करने के पक्ष में हैं ताकि आम आदमी को दिल्ली तक की लंबी और खर्चीली यात्रा न करनी पड़े। उन्होंने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 226 की शक्ति इतनी व्यापक और लचीली है कि यह सुनिश्चित करती है कि भारत में व्यक्तिगत स्वतंत्रता कभी भी अनियंत्रित सत्ता की दया पर निर्भर नहीं रहेगी।

डिजिटल युग की चुनौतियों को रेखांकित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने 'दीवारों के बिना अदालत' (Court without walls) का एक नया विजन देश के सामने रखा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि 21वीं सदी में न्याय तक पहुंच का अर्थ केवल अदालत परिसर में प्रवेश करना नहीं है, बल्कि यह तकनीकी समानता पर निर्भर है। सीजेआई ने उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की एक आदिवासी महिला या पूर्वोत्तर के किसी दुर्गम इलाके का श्रमिक केवल न्याय मांगने के लिए सैकड़ों मील का सफर तय करने को मजबूर नहीं होना चाहिए। उन्होंने वर्चुअल सुनवाई को किसी आपातकालीन उपाय के बजाय न्यायपालिका के एक 'स्थायी स्तंभ' के रूप में स्वीकार करने की वकालत की। यद्यपि तकनीक के इस अनिवार्य उपयोग को लेकर बार और बेंच के कुछ वर्गों में असहमति की अपुष्ट खबरें आती रही हैं, लेकिन सीजेआई के इस ताजा बयान ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की अदालतें पूरी तरह डिजिटल और जनसुलभ होंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय की महिमा तभी बनी रहती है जब वह आम आदमी से महज कुछ मील की दूरी पर उपलब्ध हो, न कि सालों के इंतजार और भारी खर्च के बाद मिले।

सीजेआई सूर्यकांत ने वकीलों और कानूनी बिरादरी को भी आत्ममंथन की सलाह देते हुए कहा कि अनुच्छेद 226 का उपयोग केवल गंभीर संवैधानिक संकटों के लिए होना चाहिए, न कि तुच्छ और आधारहीन याचिकाओं के जरिए अदालती समय बर्बाद करने के लिए। उन्होंने राज्य और जिला स्तर पर कानूनी सेवा प्राधिकरणों को इतना सशक्त बनाने का सुझाव दिया कि न्याय एक निष्क्रिय अधिकार के बजाय एक सक्रिय 'राज्य-गारंटीकृत सेवा' बन सके। विश्लेषकों का मानना है कि मुख्य न्यायाधीश का यह भाषण केवल एक व्याख्यान नहीं बल्कि देश की न्याय प्रणाली के लिए एक 'वारंट' की तरह है, जो यह मांग करता है कि न्यायपालिका को अब सहानुभूति और प्रभावशीलता के साथ आम जन की शिकायतों पर बोलना होगा। विश्वस्त सूत्रों के हवाले से यह भी खबर मिल रही है कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही हाई कोर्ट्स के लिए नए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है ताकि रिट याचिकाओं पर पहली ही सुनवाई में अंतरिम राहत या स्थगन आदेशों की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और त्वरित बनाया जा सके। अंततः सीजेआई का यह संदेश स्पष्ट है कि न्याय की सुरक्षा का कवच समाज के केवल विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए नहीं बल्कि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के लिए भी उतना ही सुलभ होना चाहिए।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-