हाई प्रोफाइल साइबर फ्रॉड केस में पुलिस की गोपनीय घेराबंदी, तकनीक और डिजिटल साक्ष्यों के जरिए मास्टरमाइंड की तलाश तेज

हाई प्रोफाइल साइबर फ्रॉड केस में पुलिस की गोपनीय घेराबंदी, तकनीक और डिजिटल साक्ष्यों के जरिए मास्टरमाइंड की तलाश तेज

प्रेषित समय :20:27:24 PM / Sat, Jan 24th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. गोरखपुर क्षेत्र में एक नागरिक के साथ हुई 4.21 लाख रुपये की साइबर ठगी का मामला अब जांच के ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां पुलिस की कार्यप्रणाली और डिजिटल फॉरेंसिक की भूमिका सबसे अहम हो गई है। हालांकि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से अभी तक इस मामले की प्रगति को लेकर कोई औपचारिक बयान या आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन अपुष्ट  सूत्रों के हवाले से यह बड़ी जानकारी निकलकर सामने आ रही है कि विभाग की एक विशेष टीम इस वारदात की तह तक पहुंचने के लिए गोपनीय रूप से सक्रिय हो चुकी है। इस जांच का मुख्य केंद्र बिंदु वह डिजिटल ट्रेल है जो अपराधियों ने पैसे ट्रांसफर करते समय पीछे छोड़ी है। चूंकि घटना में क्रेडिट कार्ड अपडेट और टिकट कैंसिलेशन जैसे संवेदनशील बहाने का उपयोग किया गया था, इसलिए यह माना जा रहा है कि पुलिस अब उन सर्विस प्रोवाइडर्स और सर्वरों की कुंडली खंगाल रही है जहां से यह फर्जी कॉल या लिंक जनरेट हुआ था। हालांकि जांच एजेंसियां अभी खुलकर कुछ भी कहने से बच रही हैं, लेकिन सूत्रों का दावा है कि आरोपियों के संदिग्ध ठिकानों और उनके द्वारा उपयोग किए गए बैंक खातों की पहचान करने के लिए 'एनालिटिकल टूल्स' की मदद ली जा रही है।

इस पूरे प्रकरण में डिजिटल फॉरेंसिक की भूमिका किसी भी अन्य साक्ष्य से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि साइबर अपराध की दुनिया में भौतिक सबूतों का मिलना लगभग नामुमकिन होता है। जानकारी के अनुसार, पुलिस की तकनीकी इकाई पीड़ित के मोबाइल डिवाइस का विस्तृत विश्लेषण कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या इसमें कोई 'मैलवेयर' या 'रिमोट एक्सेस टूल' इंस्टॉल किया गया था। यद्यपि विभागीय स्तर पर इस तकनीकी जांच की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है, परंतु जानकार मान रहे हैं कि जिस तरह से बड़ी राशि पार की गई है, वह बिना किसी उन्नत तकनीकी सेंधमारी के संभव नहीं है। पुलिस की यह गोपनीय कवायद अपराधियों को किसी भी प्रकार की भनक लगने से बचाने के लिए भी हो सकती है, क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में अपराधी सतर्क होते ही अपने डिजिटल फुटप्रिंट्स मिटा देते हैं। विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो पुलिस अब उन आईपी एड्रेस और वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) के सुराग ढूंढ रही है जिनका उपयोग ठगों ने अपनी असली लोकेशन छुपाने के लिए किया होगा। यह पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल है और इसमें बैंकों के सर्वर लॉग्स की जांच भी शामिल है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि ट्रांजेक्शन किस समय और किस गेटवे से प्रोसेस हुआ।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जांच में पुलिस को सबसे बड़ी चुनौती उन फर्जी दस्तावेजों से मिलती है जिनके आधार पर ठगी के लिए इस्तेमाल किए गए सिम कार्ड और बैंक खाते खोले जाते हैं। भले ही अभी पुलिस प्रशासन ने किसी भी गिरफ्तारी या सफलता की आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन साइबर सेल के सूत्रों का संकेत है कि टीम ने कुछ संदिग्ध ट्रांजेक्शन पैटर्न्स को मार्क किया है। यह पैटर्न बताते हैं कि पैसे को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से घुमाया गया ताकि पुलिस को उलझाया जा सके, जिसे बैंकिंग शब्दावली में 'लेयरिंग' कहा जाता है। पुलिस की इस अदृश्य कार्रवाई का उद्देश्य केवल आरोपियों को पकड़ना ही नहीं है, बल्कि उस पूरे सिंडिकेट को ध्वस्त करना है जो शहर के मासूम नागरिकों को अपना निशाना बना रहा है। इस संवेदनशील मोड़ पर जांच का गोपनीय रहना ही उसकी सफलता की कुंजी माना जा रहा है। आम जनता के बीच भी इस घटना को लेकर काफी चर्चा है और लोग पुलिस की ओर से किसी ठोस आधिकारिक अपडेट का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उन्हें पता चल सके कि उनकी सुरक्षा के लिए डिजिटल मोर्चे पर क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

वर्तमान में स्थिति यह है कि मामला पूरी तरह से तकनीकी जांच के दायरे में है और पुलिस की अलग-अलग टीमें डेटा को डिकोड करने में जुटी हैं। आधिकारिक सूत्रों की चुप्पी इस बात का संकेत हो सकती है कि मामला किसी बड़े गिरोह से जुड़ा है और समय से पहले जानकारी सार्वजनिक करने से जांच प्रभावित हो सकती है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि पुलिस ने अपनी पूरी ताकत इस गुत्थी को सुलझाने में झोंक दी है और डिजिटल फॉरेंसिक की रिपोर्ट आने के बाद ही इस पूरे खेल का पर्दाफाश हो सकेगा। जब तक पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक ब्रीफिंग नहीं आती, तब तक केवल कयासों का बाजार गर्म है, लेकिन विभागीय हलचल बता रही है कि कानून के हाथ बहुत जल्द अपराधियों तक पहुंचने वाले हैं। शहर के नागरिकों को भी सलाह दी जा रही है कि वे आधिकारिक पुलिस सूचनाओं पर ही भरोसा करें और अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-