नई दिल्ली. आधुनिक चिकित्सा पद्धति में 'एक्सपेक्टेड डेट ऑफ डिलीवरी' (EDD) के साथ ही अब समाज में एक नया चलन तेजी से बढ़ा है, जहाँ अभिभावक अपने शिशु के जन्म के लिए शुभ मुहूर्त की तलाश में ज्योतिषियों के द्वार पहुँच रहे हैं। हालाँकि, इस बढ़ते रुझान के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों और गंभीर ज्योतिषियों ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील चेतावनी दी है कि डिलीवरी के लिए मुहूर्त का चयन कभी भी चिकित्सा सुरक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। आधिकारिक चिकित्सा मानदंडों और अनुभवी ज्योतिषीय शोधों के हवाले से यह स्पष्ट किया गया है कि ज्योतिष का उद्देश्य केवल उपलब्ध समय सीमा के भीतर सकारात्मक ऊर्जा की तलाश करना है, न कि डॉक्टर की सलाह को चुनौती देना। वर्तमान समय में जब सीजेरियन डिलीवरी एक विकल्प के रूप में उपलब्ध है, तब लग्न, चंद्र राशि और नक्षत्र के माध्यम से भाग्य सुधारने की कोशिशें तो की जा रही हैं, लेकिन अपुष्ट और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर यह भी देखा गया है कि प्रकृति और ईश्वर की इच्छा के आगे मानवीय गणनाएं अक्सर गौण साबित होती हैं।
इस विषय का विश्लेषणात्मक पहलू यह है कि किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली के तीन मुख्य आधार—लग्न, चंद्र राशि और नक्षत्र—ग्रहों के निरंतर गोचर पर निर्भर करते हैं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, शनि, गुरु और राहु-केतु जैसे भारी ग्रह महीनों और वर्षों तक अपनी स्थिति नहीं बदलते। ऐसे में डॉक्टर द्वारा दी गई 10 से 15 दिनों की सीमित अवधि में ग्रहों को 'मनचाहे' स्थान पर बैठाना असंभव है। उदाहरण के तौर पर, यदि गोचर में मंगल नीच राशि में है, तो वह अगले कुछ दिनों में उच्च का नहीं हो जाएगा। यहाँ ज्योतिष की भूमिका केवल इतनी रह जाती है कि वह उपलब्ध समय में ऐसी 'लग्न' का चुनाव करे जिससे उन ग्रहों का दुष्प्रभाव कम हो सके और वे कुंडली के शुभ भावों में स्थित हों। यद्यपि माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे की पहली महादशा किसी शुभ ग्रह की हो, लेकिन विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि जीवन के चक्र में सभी नौ ग्रहों की दशाएं अपने निश्चित क्रम में आती हैं, इसलिए केवल प्रारंभिक दशा को ही संपूर्ण भाग्य मान लेना एक संकुचित दृष्टिकोण है।
सबसे गंभीर पक्ष जो इस रिपोर्ट के केंद्र में है, वह है 'सुरक्षा बनाम शुभता' का द्वंद्व। चिकित्सा जगत के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि कई बार मुहूर्त के चक्कर में डिलीवरी को टालना या समय से पहले करवाना माता और शिशु दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। ज्योतिष शास्त्र भी स्पष्ट रूप से यही शिक्षा देता है कि मनुष्य का कर्तव्य केवल सही दिशा में प्रयास करना है, जबकि अंतिम परिणाम ईश्वर और प्रकृति के अधीन है। मुहूर्त एक संतुलन की प्रक्रिया है जहाँ अक्सर एक पक्ष (जैसे नक्षत्र) को मजबूत करने पर दूसरा पक्ष (जैसे लग्न) कमजोर हो सकता है। अतः, एक विवेकपूर्ण दृष्टिकोण यही है कि यदि डॉक्टर स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुमति दें, तभी लग्न शुद्धि का प्रयास किया जाना चाहिए। अंततः, यह समझना अनिवार्य है कि एक स्वस्थ शिशु का जन्म ही सबसे बड़ा 'शुभ मुहूर्त' है और इसमें डॉक्टर की सलाह को सर्वोच्च प्राथमिकता देना ही धर्म और विज्ञान दोनों का वास्तविक सार है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

