भारतीय वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का निर्माण केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा के संचरण का एक माध्यम है. वास्तु में जहां खिड़कियों, दरवाजों और स्तंभों की संख्या को 'सम' (Even) रखने का निर्देश है, वहीं सीढ़ियों के टप्पों को 'विषम' (Odd) रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इसके पीछे मुख्य रूप से 'दाहिने पैर' की शुभता और शारीरिक संतुलन का तर्क दिया गया है.
सम और विषम संख्या का महत्व
वास्तु शास्त्र में सम संख्या को पूर्णता का प्रतीक माना गया है. इसीलिए घर के स्थिर अंगों जैसे दरवाजे और खिड़कियों के लिए सम संख्या चुनी जाती है ताकि घर में पूर्णता और स्थिरता बनी रहे. इसके विपरीत, सीढ़ियां 'गति' का प्रतीक हैं. गति में निरंतरता और शुभ परिणाम के लिए विषम संख्या का चयन किया जाता है.
दाहिना पैर और शुभता का प्रतीक
हिंदू धर्म और वास्तु में दाहिने अंग (दाहिना हाथ और पैर) को अधिक सक्रिय, ऊर्जावान और शुभ माना गया है. किसी भी शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, विवाह के फेरे या मंदिर में प्रवेश के समय दाहिना पैर पहले आगे बढ़ाने का विधान है. दाहिना पैर शरीर को स्थायित्व और मजबूती प्रदान करता है.
पैर बढ़ाने का मनोवैज्ञानिक और शारीरिक तर्क
जब भी कोई व्यक्ति सीढ़ी चढ़ना शुरू करता है, तो प्राकृतिक रूप से उसका दाहिना पैर ही पहले टप्पे पर पड़ता है.
विषम संख्या का लाभ: यदि सीढ़ियों की कुल संख्या विषम (जैसे 11, 15, 17, 21 आदि) होती है, तो सीढ़ी पूरी करने के बाद जब व्यक्ति अगले फ्लोर पर पहुंचता है, तो उसका अंतिम कदम भी दाहिने पैर पर ही समाप्त होता है.
सम संख्या की हानि: यदि सीढ़ियों की संख्या सम (जैसे 10, 12, 16) होगी, तो अंतिम कदम बाएं पैर पर पड़ेगा, जिसे वास्तु शास्त्र में 'अपूर्ण' या 'अशुभ' माना जाता है.
ऋषि-मुनियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
हमारे प्राचीन ऋषियों ने जब वास्तु के नियम बनाए, तो उन्होंने मानव शरीर की बनावट और ऊर्जा के केंद्र को ध्यान में रखा. दाहिना पैर सीधा और सक्रिय ऊर्जा (सूर्य स्वर) से जुड़ा है, जबकि बायां पैर शीतल ऊर्जा (चंद्र स्वर) से. ऊंचाई पर चढ़ते समय सक्रिय ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसीलिए दाहिने पैर से शुरुआत और दाहिने पर ही अंत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है.

