अनिल मिश्र,पटना. बिहार की राजधानी पटना से छात्र राजनीति और सामाजिक समानता की एक बड़ी खबर सामने आ रही है जहां 'छात्र शक्ति राष्ट्र शक्ति' और 'विश्व के छात्र एक हो' के नारों के साथ एक नए आंदोलन की नींव रखी गई है. केंद्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए लागू किए गए 'यूजीसी प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन एक्ट 2026' में सामान्य जाति के छात्रों को शामिल न किए जाने के विरोध में 'स्टूडेंट समानता संघर्ष समिति' का गठन किया गया है. अनिल मिश्र की रिपोर्ट के अनुसार, इस समिति ने सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक शांतिपूर्ण लेकिन चरणबद्ध राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाने का संकल्प लिया है. आंदोलनकारियों का स्पष्ट तर्क है कि जब अधिनियम का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव को मिटाना है, तो इसमें सामान्य वर्ग को बाहर रखकर समानता की कल्पना कैसे की जा सकती है.
इस नवगठित संगठन ने अपनी रणनीतिक शुरुआत के लिए 11 सदस्यीय एक शक्तिशाली संचालन समिति की घोषणा की है. इस समिति में बिहार के विभिन्न जिलों और क्षेत्रों के अनुभवी चेहरों को शामिल किया गया है, जिनमें विजय कुमार मिट्ठू, पूर्व विधायक मोहम्मद खान अली, रवि कुमार पांडेय, डॉ. गगन कुमार मिश्रा, प्रो. अमर सिंह सिरमौर, डॉ. अहमद हुसैन मक्की, विनोद श्रीवास्तव के साथ-साथ जहानाबाद के हरि नारायण द्विवेदी, औरंगाबाद के अरविंद कुमार सिंह, नवादा के सतीश कुमार उर्फ मन्टन सिंह और अरवल के छोटे शर्मा प्रमुख हैं. इन सदस्यों को न केवल संपूर्ण बिहार में संगठन के विस्तार की जिम्मेदारी सौंपी गई है, बल्कि इनका मुख्य लक्ष्य देश के सभी राज्यों के छात्रों को एक मंच पर लाकर केंद्र सरकार के इस निर्णय के खिलाफ एक वैचारिक और लोकतांत्रिक युद्ध छेड़ना है. संगठन का मानना है कि उच्च शिक्षा में न्याय तभी संभव है जब नियम सबके लिए समान हों.
समिति के पदाधिकारियों ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि 16 जनवरी 2026 से पूरे देश में लागू हुए इस नए यूजीसी एक्ट में सामान्य वर्ग की जातियों—जैसे ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, शेख, सैयद, पठान और मल्लिक—को दरकिनार कर दिया गया है. छात्र नेताओं का कहना है कि जाति, लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए इस नियम से सामान्य जाति के छात्रों को अलग रखना विरोधाभासी है. इस विसंगति के कारण सामान्य वर्ग के छात्रों और उनके अभिभावकों में भारी आक्रोश व्याप्त है. उनका तर्क है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से संघर्ष कर रहे सामान्य वर्ग के युवाओं को इस दायरे से बाहर रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. संगठन की मांग है कि इन सभी जातियों को भी अधिनियम के तहत सुरक्षा और समानता के दायरे में लाया जाए ताकि शिक्षण संस्थानों में वास्तव में एक समावेशी वातावरण तैयार हो सके.
वर्तमान में यह आंदोलन बिहार की धरती से अंकुरित होकर राष्ट्रीय स्तर पर फैलने की तैयारी में है. संचालन समिति ने स्पष्ट किया है कि आगामी दिनों में जिला स्तर पर बैठकें आयोजित की जाएंगी और छात्रों के बीच जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा. पटना में हुई इस घोषणा के बाद राज्य के शैक्षणिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. जानकारों का मानना है कि यदि सरकार ने इस असंतोष को समय रहते संबोधित नहीं किया, तो यह छात्र आंदोलन एक बड़ा रूप ले सकता है. 'स्टूडेंट समानता संघर्ष समिति' ने चेतावनी दी है कि वे अपने हक के लिए सड़क से लेकर संसद तक आवाज उठाएंगे और तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक सामान्य वर्ग के छात्रों को भी इस समानता कानून में उचित स्थान नहीं मिल जाता. यह मांग केवल एक वर्ग की नहीं, बल्कि 'एक राष्ट्र, एक नियम' के उस सिद्धांत की है जो किसी भी छात्र के साथ उसकी पहचान के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

