सीढ़ियां चढ़ते समय हल्की-सी सांस फूलना आम बात मानी जाती है, क्योंकि इस दौरान शरीर को गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ काम करना पड़ता है और हृदय व फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। लेकिन अगर यही सांस फूलना जरूरत से ज्यादा हो, बार-बार होने लगे या धीरे-धीरे बढ़ता जाए, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि यह स्थिति कई बार शरीर की ओर से मिलने वाली गंभीर चेतावनी हो सकती है, जो फेफड़ों, दिल या खून से जुड़ी किसी बीमारी की ओर इशारा करती है।
नई दिल्ली स्थित फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट के सीनियर कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अवि कुमार के मुताबिक, मेहनत करने पर सांस फूलना चिकित्सकीय दृष्टि से एक अहम संकेत है। इसे केवल कमजोरी या उम्र का असर मानकर टाल देना सही नहीं है। खास बात यह है कि कई बार फिट दिखने वाले और सामान्य दिनचर्या में कोई परेशानी महसूस न करने वाले लोगों में भी यह समस्या दिखाई देती है, जो किसी अंदरूनी बीमारी की शुरुआत हो सकती है।
डॉ. कुमार बताते हैं कि सीढ़ियां चढ़ना मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि मानी जाती है। इसमें दिल को तेजी से खून पंप करना पड़ता है, फेफड़ों को ज्यादा ऑक्सीजन लेनी होती है और मांसपेशियों को अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है। स्वस्थ व्यक्ति का शरीर इस तालमेल को आसानी से बना लेता है, लेकिन जब किसी सिस्टम में गड़बड़ी होती है, तो सबसे पहले सांस फूलने के रूप में इसका संकेत मिलता है।
फेफड़ों से जुड़ी कई बीमारियां शुरुआत में आराम की अवस्था में कोई खास लक्षण नहीं दिखातीं। व्यक्ति सामान्य बैठने या चलने-फिरने में ठीक महसूस करता है, लेकिन जैसे ही थोड़ा अधिक शारीरिक परिश्रम होता है, समस्या सामने आने लगती है। अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी ऐसी ही बीमारियां हैं, जिनमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और हवा का प्रवाह बाधित हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि सीढ़ियां चढ़ते या तेज चलने पर व्यक्ति को अचानक सांस की कमी महसूस होने लगती है।
इसके अलावा कुछ मामलों में इंटरस्टिशियल लंग डिजीज, फेफड़ों की रक्त नलियों से जुड़ी समस्याएं या फेफड़ों की पुरानी क्षति भी सांस फूलने की वजह बन सकती हैं। इन स्थितियों में फेफड़े पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन को खून में नहीं पहुंचा पाते, जिससे शरीर को मेहनत के समय ज्यादा परेशानी होती है। कई बार लोग इसे बढ़ती उम्र या कमजोरी समझकर अनदेखा कर देते हैं, जबकि यह बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है।
सांस फूलने की समस्या केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार दिल की बीमारियां भी इसका एक बड़ा कारण हो सकती हैं। जब दिल किसी कारणवश मेहनत के दौरान पर्याप्त मात्रा में खून पंप नहीं कर पाता, तो शरीर को ऑक्सीजन की कमी होने लगती है और व्यक्ति को जल्दी सांस चढ़ने लगती है। हार्ट फेल्योर, हार्ट वाल्व से जुड़ी दिक्कतें या हार्ट मसल की कमजोरी जैसी समस्याओं में यह लक्षण अक्सर शुरुआती चेतावनी के तौर पर सामने आता है।
खून की कमी यानी एनीमिया भी सांस फूलने की एक आम लेकिन गंभीर वजह है। एनीमिया में खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाने की क्षमता घट जाती है। ऐसे में थोड़ा-सा परिश्रम भी शरीर को भारी लगने लगता है और व्यक्ति को थकान के साथ सांस लेने में दिक्कत महसूस होती है। महिलाओं में यह समस्या अधिक देखी जाती है, लेकिन पुरुष भी इससे अछूते नहीं हैं।
डॉ. कुमार का कहना है कि अगर सांस फूलना अचानक शुरू हुआ हो, नया हो, पहले की तुलना में तेजी से बढ़ रहा हो या की गई मेहनत के अनुपात में बहुत ज्यादा लग रहा हो, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसे लक्षणों में देरी करना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि समय पर जांच और इलाज न मिलने से बीमारी आगे बढ़ सकती है और इलाज जटिल हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार सही कारण का पता लगाने के लिए कुछ जरूरी जांचें कराई जाती हैं। सांस की नलियों की स्थिति जानने के लिए स्पाइरोमेट्री टेस्ट किया जाता है, जिससे यह पता चलता है कि फेफड़े हवा को कितनी अच्छी तरह अंदर-बाहर कर पा रहे हैं। फेफड़ों की बनावट और किसी संभावित क्षति को देखने के लिए एक्स-रे या सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग जांचें की जाती हैं। यह जानने के लिए कि फेफड़े ऑक्सीजन को खून में कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचा रहे हैं, डिफ्यूजन कैपेसिटी टेस्ट मददगार होता है।
दिल से जुड़ी समस्याओं के संदेह में 2डी इकोकार्डियोग्राफी कराई जाती है, जिससे दिल की पंपिंग क्षमता और फेफड़ों की रक्त नलियों में दबाव का आकलन किया जा सकता है। इसके साथ ही मेहनत के दौरान ऑक्सीजन सैचुरेशन की जांच की जाती है, ताकि यह देखा जा सके कि कहीं गतिविधि के समय ऑक्सीजन स्तर खतरनाक रूप से तो नहीं गिर रहा। खून की जांच से एनीमिया या अन्य मेटाबॉलिक गड़बड़ियों का भी पता लगाया जाता है।
डॉक्टरों का कहना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं। सांस फूलना ऐसा ही एक लक्षण है, जिसे लोग थकान, वजन बढ़ने या फिटनेस की कमी से जोड़कर टाल देते हैं। लेकिन अगर यह समस्या लगातार बनी रहे, तो इसे हल्के में लेना सही नहीं है। समय पर जांच और सही इलाज न केवल गंभीर बीमारियों को बढ़ने से रोक सकता है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बना सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और धूम्रपान से दूरी फेफड़ों और दिल को स्वस्थ रखने में मदद करती है। साथ ही अगर शरीर कोई असामान्य संकेत दे रहा हो, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना ही समझदारी है। सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना अगर रोजमर्रा की बात बन गई है, तो यह केवल थकान नहीं, बल्कि शरीर की ओर से दी जा रही एक गंभीर चेतावनी भी हो सकती है, जिसे समय रहते समझना और उस पर कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

