जबलपुर. सूचना के अधिकार कानून (RTI) के तहत गरीब और वंचित वर्ग को सशक्त बनाने की मंशा को ठेस पहुंचाने वाला एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला सामने आया है. यहां सूचना के अधिकार के तहत जानकारी प्राप्त करने वाले एक बीपीएल कार्डधारक से चार लाख आठ सौ पचास रुपये की भारी-भरकम राशि की मांग किए जाने का आरोप लगा है. मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य मानव अधिकार आयोग ने र कलेक्टर को तत्काल कार्रवाई कर प्रकरण का निराकरण करने के निर्देश जारी किए हैं. यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि आरटीआई कानून के मूल उद्देश्य पर भी सवाल खड़े करती है.
मामला लॉ छात्र अमन वंशकार से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के नगर वृत उत्तर संभाग जबलपुर के अंतर्गत मानेगांव पिपरिया डीसी में पदस्थ नियमित एवं आउटसोर्स कर्मचारियों तथा पंजीकृत उपभोक्ताओं की प्रमाणित जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी थी. अमन वंशकार ने अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया था कि वे बीपीएल परिवार के सदस्य हैं और इसके समर्थन में वैध प्रमाण-पत्र भी आवेदन के साथ संलग्न किया था. सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि बीपीएल परिवार के सदस्यों से न तो आवेदन शुल्क लिया जाएगा और न ही जानकारी देने के लिए कोई शुल्क देय होगा.
इसके बावजूद विभागीय सूचना अधिकारी एवं सहायक अभियंता द्वारा लिखित रूप से अमन वंशकार से सूचना प्रदान करने के बदले चार लाख आठ सौ पचास रुपये जमा करने के लिए कहा गया. यह मांग सामने आने के बाद न केवल आवेदक बल्कि सूचना के अधिकार से जुड़े जानकारों और सामाजिक संगठनों में भी आक्रोश फैल गया. इतनी बड़ी राशि की मांग एक बीपीएल परिवार के सदस्य के लिए न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि कानून की सीधी अवहेलना भी मानी जा रही है.
पीड़ित आवेदक अमन वंशकार ने इस पूरे मामले को राज्य मानव अधिकार आयोग के समक्ष उठाया. शिकायत में उन्होंने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 7(5) के तहत बीपीएल परिवार के सदस्यों को सूचना निशुल्क प्रदान की जानी चाहिए. उन्होंने यह भी बताया कि आवेदन के साथ सभी आवश्यक प्रमाण-पत्र संलग्न होने के बावजूद विभाग द्वारा न केवल जानकारी देने से इनकार किया गया, बल्कि लिखित रूप से भारी रकम की मांग की गई, जो मानसिक उत्पीड़न के समान है.
राज्य मानव अधिकार आयोग ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण को मानव अधिकारों के उल्लंघन की श्रेणी में माना. आयोग का मत है कि सूचना के अधिकार से वंचित करना, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के मामले में, उसके मौलिक अधिकारों का हनन है. आयोग ने इस आधार पर जबलपुर कलेक्टर को निर्देश जारी किए हैं कि वे मामले की जांच कर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करें और प्रकरण का शीघ्र निराकरण सुनिश्चित करें.
इस घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सूचना के अधिकार जैसे जनहितकारी कानून का भी कुछ स्तरों पर गलत तरीके से उपयोग या दुरुपयोग किया जा रहा है. आरटीआई कानून का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है, ताकि आम नागरिक सरकारी तंत्र पर सवाल कर सके. लेकिन जब उसी कानून के तहत जानकारी मांगने पर गरीब व्यक्ति से लाखों रुपये की मांग की जाती है, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गहरा सवाल खड़ा करता है.
फिलहाल राज्य मानव अधिकार आयोग के निर्देश के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है. अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच के बाद दोषी अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है और क्या बीपीएल कार्डधारक को उसका कानूनी अधिकार बिना किसी शुल्क के मिल पाता है या नहीं. यह मामला जबलपुर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी है कि सूचना के अधिकार कानून के साथ किसी भी स्तर पर खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

