लेखक-परिचय. जयप्रकाश मानस, जिनका जन्म 2 अक्टूबर, 1965 को तत्कालीन मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के रायगढ़ शहर में हुआ, एक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी कलम जीवन के सूक्ष्म अनुभवों और गहन दार्शनिक विचारों को सरल शब्दों में पिरोती है। मातृभाषा उड़िया होने के बावजूद, उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। एम.ए (भाषा विज्ञान) और एमएससी (आईटी) जैसी विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें मानवीय मनोविज्ञान और आधुनिक तकनीकी पहलुओं को एक साथ समझने की अनूठी क्षमता प्रदान करती है। उनकी रचनाएँ अक्सर हमें अपने भीतर झाँकने और जीवन के गहरे अर्थों को समझने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके लघु कथा संग्रह 'बची हुई हवा' में भी इसी तरह के चिंतन और मानवीय संवेदनाओं का संगम देखने को मिलता है।
आज की लघुकथा: 'टूटन की पूजा'
आधी रात। मंदिर का दीपक टिमटिमा रहा था जैसे कोई प्रश्नचिह्न। चरणों में पड़ा पत्थर धीरे से मूर्ति की ओर खिसका, उसकी चिकनी सतह पर अपनी खुरदराई छाया देखकर बुदबुदाया : "हम तो एक ही पहाड़ की चट्टान के टुकड़े थे। आज तुम्हारे चरणों में चंदन, मेरे ऊपर पैरों के निशान। यह भेदभाव क्यों?"
मूर्ति के अधरों पर एक कोमल रेखा खिंची : "उस दिन याद है जब शिल्पी की छैनी ने पहली चोट की थी? तुम फूट-फूटकर रो पड़े थे - 'बस! मुझे और न तराशो!' मैंने हर आघात को गले लगाया। हर टूटन को अपना अंग बनाया। क्योंकि जो टूटता नहीं, वह कभी पूजा नहीं जाता, भाई।"
पत्थर काँप उठा। भोर होने तक वह मंदिर से लुढ़ककर शिल्पी की दहलीज पर जा पहुँचा। सुबह जब कारीगर ने अपना उपकरण उठाया तो देखा - एक पत्थर उसके हाथों की प्रतीक्षा में सजीव हो उठा था, मानो कह रहा हो : "अब मेरी बारी है।" और फिर वह पत्थर भी टूटने लगा... एक नए अर्थ की ओर।
कल के लिए प्रतीक्षा करें!
कल हम जयप्रकाश मानस जी की एक और मार्मिक लघुकथा 'पत्थरों की पंचायत' के साथ उपस्थित होंगे, जो हमें सामूहिकता और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाएगी।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

