देश में बदलते सामाजिक परिवेश के बीच अंतरजातीय विवाह को लेकर चर्चा लगातार बढ़ रही है, लेकिन ज्योतिष के जानकारों का कहना है कि कई मामलों में इंटरकास्ट मैरिज केवल सामाजिक बदलाव नहीं बल्कि कुंडली में बने विशेष ग्रह योगों का परिणाम भी होती है। ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार कई युवक-युवतियों की शादी में लगातार देरी या अपनी जाति में रिश्ते तय नहीं हो पाना केवल पारिवारिक या सामाजिक कारण नहीं होता बल्कि इसके पीछे जन्म कुंडली में बने ग्रहों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि कुंडली में इंटरकास्ट विवाह के योग बनते हैं तो व्यक्ति की शादी अक्सर अपनी जाति से बाहर ही होने की संभावना अधिक रहती है।
ज्योतिष विद्वानों का कहना है कि कुंडली में सातवां भाव विवाह और जीवनसाथी से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण भाव माना जाता है। यदि इस भाव पर कुछ विशेष ग्रहों का प्रभाव पड़ता है तो विवाह पारंपरिक सीमाओं से हटकर होने की संभावना बढ़ जाती है। विशेष रूप से राहु और शनि को ऐसे ग्रह माना जाता है जो परंपराओं और सामाजिक नियमों को तोड़ने वाले प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इसी वजह से जब यह ग्रह सातवें भाव या उसके स्वामी पर प्रभाव डालते हैं तो जाति, धर्म या समाज की परंपराओं से हटकर विवाह होने की संभावना अधिक हो जाती है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यदि कुंडली का सातवां भाव राहु, शनि या केतु जैसे ग्रहों से प्रभावित हो या सातवें भाव का स्वामी इन ग्रहों के साथ युति या दृष्टि संबंध में हो तो यह संकेत माना जाता है कि व्यक्ति का विवाह पारंपरिक व्यवस्था से अलग हो सकता है। इसके अलावा विवाह के कारक ग्रहों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। पुरुषों की कुंडली में शुक्र और महिलाओं की कुंडली में गुरु विवाह का मुख्य कारक माना जाता है। यदि यह ग्रह भी राहु, शनि या केतु के प्रभाव में आ जाते हैं तो अंतरजातीय विवाह की संभावना और अधिक मजबूत हो जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में परिवार अक्सर अपनी जाति में ही रिश्ते तलाशता रहता है, लेकिन कई वर्षों तक प्रयास करने के बावजूद विवाह तय नहीं हो पाता। ज्योतिष के जानकार इसे कुंडली के संकेतों की अनदेखी मानते हैं। उनका कहना है कि जब कुंडली स्पष्ट रूप से अंतरजातीय विवाह की ओर संकेत करती है, तब स्वकास्ट में रिश्ता तलाशने से केवल समय की बर्बादी होती है और विवाह में अनावश्यक देरी होती रहती है। कई मामलों में देखा गया है कि जब ऐसे युवक या युवती इंटरकास्ट विवाह के लिए सहमति देते हैं, तब शादी जल्दी तय हो जाती है।
ज्योतिष विशेषज्ञों ने कई उदाहरणों के माध्यम से भी इसे समझाया है। उनके अनुसार मेष लग्न की कुंडली में यदि सातवें भाव का स्वामी शुक्र राहु या शनि के प्रभाव में हो और सातवां भाव भी इन ग्रहों से प्रभावित हो तो ऐसे जातक का विवाह अंतरजातीय होने की संभावना अधिक रहती है। इसी प्रकार सिंह लग्न में यदि सातवें भाव का स्वामी शनि राहु या केतु से संबंध में हो और सातवां भाव भी इन ग्रहों के प्रभाव में हो तो विवाह अपनी जाति के बाहर होने की संभावना प्रबल हो जाती है।
इसी तरह मीन लग्न की कुंडली में यदि सातवें भाव का स्वामी बुध मजबूत स्थिति में होने के बावजूद राहु, शनि या केतु के प्रभाव में हो और सातवां भाव भी इन ग्रहों से प्रभावित हो तो यह भी अंतरजातीय विवाह का स्पष्ट संकेत माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि यह केवल संयोग नहीं बल्कि ग्रहों की स्थिति के कारण बनने वाला निश्चित योग होता है।
ज्योतिष विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कुंडली में विवाह योग होने के बावजूद यदि विवाह नहीं हो पा रहा है तो इसका मतलब यह नहीं होता कि विवाह संभव नहीं है। कई बार कुंडली केवल यह संकेत देती है कि विवाह किस दिशा में संभव होगा। यदि व्यक्ति उस दिशा को समझकर निर्णय लेता है तो विवाह में आने वाली बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। ऐसे मामलों में कुंडली को सही तरीके से समझना और उसके अनुसार निर्णय लेना महत्वपूर्ण माना जाता है।
समाज में अंतरजातीय विवाह को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिलते हैं। जहां एक ओर नई पीढ़ी इसे सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देख रही है, वहीं कई परिवार आज भी परंपरागत व्यवस्था को महत्व देते हैं। हालांकि ज्योतिष विशेषज्ञों का मानना है कि कुंडली के संकेतों को समझकर निर्णय लेने से विवाह संबंधी समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
ज्योतिष शास्त्र में राहु और शनि को परिवर्तन और परंपरा से हटकर सोच का प्रतीक माना गया है। इन ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में कई बार अचानक बदलाव लाता है। विवाह के मामलों में यह प्रभाव अक्सर सामाजिक सीमाओं को तोड़ने के रूप में दिखाई देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे ग्रह योग वाले लोग अक्सर अपने जीवनसाथी का चयन स्वयं करते हैं और पारंपरिक रिश्तों की तुलना में प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह की संभावना अधिक रहती है।
ज्योतिषाचार्यों का यह भी मानना है कि आधुनिक समय में बढ़ते अंतरजातीय विवाह के पीछे सामाजिक बदलाव के साथ-साथ ग्रहों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। कई मामलों में परिवार और समाज के विरोध के बावजूद विवाह सफल साबित होते हैं, जिसे ज्योतिषीय दृष्टि से ग्रहों के अनुकूल प्रभाव का परिणाम माना जाता है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल कुंडली के आधार पर विवाह का निर्णय लेना उचित नहीं है। पारिवारिक सहमति, सामाजिक समझ और व्यक्तिगत निर्णय भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन यदि कुंडली में स्पष्ट रूप से अंतरजातीय विवाह का योग मौजूद हो तो इसे नजरअंदाज करने से विवाह में देरी या बार-बार असफलता जैसी स्थिति बन सकती है।
ज्योतिष के जानकारों का कहना है कि कुंडली व्यक्ति के जीवन की दिशा बताती है और यदि उसके संकेतों को सही तरीके से समझ लिया जाए तो जीवन से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है। विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में कुंडली की भूमिका को समझना कई बार सही जीवनसाथी चुनने में मददगार साबित होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि कुंडली में विवाह के साथ अंतरजातीय विवाह का स्पष्ट योग मौजूद हो तो परिवार और व्यक्ति दोनों को खुले विचारों के साथ निर्णय लेने की जरूरत होती है। उनका कहना है कि कुंडली विवाह को रोकती नहीं बल्कि उसका सही मार्ग दिखाती है और उस मार्ग को समझकर आगे बढ़ने से विवाह संबंधी परेशानियों का समाधान संभव हो जाता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

