नगर संवाददाता, जबलपुर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने मानहानि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी सक्षम प्राधिकारी के समक्ष कानूनी अधिकार का प्रयोग करते हुए की गई आपराधिक शिकायत को मानहानि नहीं माना जा सकता. जस्टिस बी.पी. शर्मा की एकलपीठ ने इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भोपाल जिला न्यायालय द्वारा एक व्यक्ति के खिलाफ शुरू की गई मानहानि की आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया. हाईकोर्ट के इस निर्णय को विधिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है.
मामला भोपाल निवासी सैयद राशिद अली और उनकी तलाकशुदा पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा हुआ है. जानकारी के अनुसार, अली की पत्नी ने विवाह के बाद पारिवारिक विवाद उत्पन्न होने पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था. इस प्रकरण में निचली अदालत ने अली को दोषी ठहराते हुए एक वर्ष की सजा सुनाई थी. हालांकि, बाद में अपीलीय न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में अली को दोषमुक्त कर दिया था. इस निर्णय को चुनौती देते हुए पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जो अभी विचाराधीन है.
उक्त घटनाक्रम के बाद सैयद राशिद अली ने अपनी पूर्व पत्नी और उसके परिजनों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं 420, 467, 468, 471, 477, 494 तथा 149 के अंतर्गत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी. इस मामले की सुनवाई के बाद भोपाल की अदालत ने 14 अक्टूबर 2023 को पत्नी और अन्य आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया था. इसके पश्चात अली की तलाकशुदा पत्नी ने उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत मानहानि का मामला दर्ज कराया. पत्नी का आरोप था कि अली ने उनके और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ झूठे आरोप लगाकर आपराधिक कार्यवाही शुरू की, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और मानसिक रूप से भी उन्हें गंभीर प्रताड़ना झेलनी पड़ी. इसके अतिरिक्त यह भी आरोप लगाया गया कि अली उन पर लंबित आपराधिक प्रकरण वापस लेने के लिए दबाव बना रहे थे.
पत्नी एवं उसके पिता के बयानों के आधार पर भोपाल जिला न्यायालय के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने अली के खिलाफ धारा 500 के तहत आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ करने का आदेश जारी कर दिया था. इस आदेश को चुनौती देते हुए अली ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की. याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत तर्क में कहा गया कि उन्होंने जो शिकायत दर्ज कराई थी वह पूरी तरह से कानून के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए सक्षम प्राधिकरण के समक्ष की गई थी. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के अपवाद 8 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सद्भावना के साथ और विधिक अधिकार के तहत किसी सक्षम अधिकारी के समक्ष शिकायत करता है, तो उसे मानहानि की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने प्रस्तुत तथ्यों और कानूनी प्रावधानों का गहन अध्ययन करने के बाद याचिकाकर्ता के तर्कों को स्वीकार कर लिया. न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि यदि कोई व्यक्ति विधिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष शिकायत करता है और वह शिकायत सद्भावना के आधार पर की गई है, तो उसे मानहानि नहीं माना जा सकता. न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून नागरिकों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए शिकायत करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है और इस अधिकार के प्रयोग को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने भोपाल जिला न्यायालय द्वारा अली के खिलाफ धारा 500 के तहत प्रारंभ की गई आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया. न्यायालय के इस निर्णय को विधि विशेषज्ञों द्वारा अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत की गई शिकायतों को केवल इस आधार पर मानहानि नहीं माना जा सकता कि वे आरोप बाद में सिद्ध नहीं हो सके.
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है, जहां व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सक्षम प्राधिकरण के समक्ष शिकायत दर्ज कराते हैं. वहीं यह फैसला यह भी सुनिश्चित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों का सामना न करना पड़े. हाईकोर्ट का यह निर्णय न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता और विधिक अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

