मुंबई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित संघ की शताब्दी व्याख्यान श्रृंखला के दौरान कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्पष्ट और विस्तृत राय रखी। वर्ली स्थित नेहरू सेंटर में आयोजित कार्यक्रम ‘सौ वर्ष का संघ प्रवास नई दिशाएं’ में संबोधन के दौरान उन्होंने विशेष रूप से बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की स्थिति, भारत में जनसंख्या संतुलन, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक दृष्टिकोण और संघ की कार्यप्रणाली पर विस्तार से चर्चा की। उनके इस संबोधन को वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कार्यक्रम में बोलते हुए मोहन भागवत ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के सामने आ रही चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लगभग सवा करोड़ हिंदू रहते हैं और यदि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने का निर्णय लेते हैं तो दुनिया भर का हिंदू समाज उनके साथ खड़ा होगा। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता और आत्मविश्वास होता है। भागवत के इस बयान को बांग्लादेश में हाल के समय में सामने आई अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं के संदर्भ में देखा जा रहा है।
बताया जा रहा है कि बांग्लादेश में छात्र आंदोलन के बाद राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी थी। यह आंदोलन उस समय तेज हुआ जब छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मृत्यु के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और बाद में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद हालात और अधिक तनावपूर्ण हो गए। इस दौरान कई घटनाओं में हिंदू नागरिकों, व्यापारियों, मजदूरों और छात्रों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आई थीं। भागवत ने इन घटनाओं को चिंता का विषय बताते हुए कहा कि विश्व स्तर पर हिंदू समाज को अपने अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा के लिए जागरूक और संगठित रहने की आवश्यकता है।
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में भारत के आंतरिक सामाजिक मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि देश में जनसंख्या संतुलन एक गंभीर विषय है और इसे केवल सरकारी नीति के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने विवाह को केवल व्यक्तिगत सहमति या निजी निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक दायित्व बताया। उन्होंने कहा कि समाज की स्थिरता और संतुलन के लिए परिवार व्यवस्था का संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है।
भागवत ने जनसंख्या असंतुलन के तीन प्रमुख कारण बताए जिनमें जन्म दर में अंतर, धर्म परिवर्तन और अवैध घुसपैठ शामिल हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे समाज और देश की सुरक्षा के लिए सतर्क भूमिका निभाएं और संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी प्रशासन को दें। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज की सामूहिक सतर्कता से ही मजबूत हो सकती है।
आर्थिक मुद्दों पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने देश की आर्थिक स्थिति के आकलन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि केवल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आधार पर देश की आर्थिक मजबूती को नहीं मापा जा सकता। उन्होंने कहा कि जीडीपी आयात और निर्यात का संकेत देता है लेकिन यह समाज की वास्तविक आर्थिक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। उन्होंने उत्पादन की मात्रा के साथ गुणवत्ता पर भी ध्यान देने की आवश्यकता बताई और कहा कि मजबूत अर्थव्यवस्था तभी संभव है जब आर्थिक विकास के साथ सामाजिक और मानवीय मूल्यों को भी महत्व दिया जाए।
मोहन भागवत ने संघ और केंद्र सरकार के संबंधों को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने उन आरोपों को खारिज किया जिनमें कहा जाता है कि संघ सरकार को पीछे से नियंत्रित करता है। उन्होंने कहा कि सरकार चलाने का अधिकार केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों का होता है और संघ किसी प्रकार की बैक सीट ड्राइविंग में विश्वास नहीं करता। उन्होंने यह भी कहा कि संघ राष्ट्रहित के हर कार्य में सरकार के साथ सहयोग करने के लिए हमेशा तैयार रहता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भागवत ने समाज की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने हाल ही में दिल्ली में हुए विस्फोट की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल खुफिया एजेंसियों की जानकारी पर्याप्त नहीं होती बल्कि समाज की सतर्कता भी आवश्यक होती है। उन्होंने नागरिकों से लापरवाही और उदासीनता छोड़कर राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जागरूक रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा से नहीं बल्कि समाज की जागरूकता और एकजुटता से भी सुनिश्चित होती है।
संघ प्रमुख ने संगठन की कार्यप्रणाली और संरचना पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ का संचालन कार्यकर्ताओं के योगदान से चलता है और संगठन कॉर्पोरेट फंडिंग पर निर्भर नहीं है। उन्होंने बताया कि संघ में नेतृत्व के अवसर सभी वर्गों के लिए खुले हैं और संगठन जातिगत भेदभाव को स्वीकार नहीं करता। उन्होंने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति सहित सभी समुदायों की भागीदारी को संघ की ताकत बताया।
भागवत ने संगठन में पारदर्शिता और ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा कि संघ भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनाता है। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य केवल संगठन विस्तार नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए समाज को जागरूक और संगठित करना है।
अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में उन्होंने राष्ट्र सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि राष्ट्र सेवा किसी पद या जिम्मेदारी तक सीमित नहीं होती और व्यक्ति के औपचारिक भूमिका से हटने के बाद भी समाज और देश के लिए कार्य जारी रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनका जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित रहेगा।
मोहन भागवत के इस विस्तृत संबोधन को कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ की वैचारिक दिशा के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विशेष रूप से बांग्लादेश में हिंदू समुदाय को लेकर दिए गए उनके बयान और भारत में जनसंख्या संतुलन पर रखी गई राय को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। वहीं संघ और सरकार के संबंधों को लेकर उनकी स्पष्ट टिप्पणी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान भागवत ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि देश की मजबूती केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं है बल्कि इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की एकता मजबूत है और देश को अस्थिर करने की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी क्योंकि भारतीय समाज की जड़ें गहरी हैं और उसकी सांस्कृतिक चेतना उसे मजबूत बनाती है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

