नई दिल्ली. पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की बहुचर्चित किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। किताब के आधिकारिक रूप से प्रकाशित होने से पहले ही उसकी प्री-प्रिंट कॉपी के ऑनलाइन प्रसार का मामला सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस हरकत में आ गई है। सोमवार को दिल्ली पुलिस ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच शुरू कर दी है। पुलिस की स्पेशल सेल ने इस कथित लीक को गंभीर मानते हुए मामला दर्ज कर लिया है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि यह संवेदनशील सामग्री आखिर किस तरह सार्वजनिक डोमेन में पहुंची।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, जांच के दौरान यह सामने आया है कि किताब की एक पीडीएफ कॉपी, जो पूरी तरह टाइपसेटेड है, कई वेबसाइटों और कुछ ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। पुलिस का कहना है कि यह पीडीएफ कॉपी उसी किताब की प्रतीत होती है, जिसे पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रकाशित किया जाना है। इतना ही नहीं, कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किताब का फाइनल कवर भी इस तरह दिखाया जा रहा है, मानो यह किताब खरीद के लिए उपलब्ध हो, जबकि वास्तविकता में इसके प्रकाशन की औपचारिक मंजूरी अभी तक नहीं मिली है।
बताया जा रहा है कि फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के प्रकाशन के लिए आवश्यक आधिकारिक क्लीयरेंस संबंधित प्राधिकरणों से अभी लंबित है। सेना से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों की आत्मकथाएं या संस्मरण प्रकाशित करने से पहले सुरक्षा और गोपनीयता के दृष्टिकोण से कई स्तरों पर जांच और अनुमति की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ऐसे में बिना अनुमति के किताब की प्री-प्रिंट कॉपी का लीक होना न सिर्फ कॉपीराइट का उल्लंघन माना जा रहा है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को लेकर भी सवाल खड़े कर रहा है।
दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस मामले में आईटी एक्ट समेत अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत जांच की जा रही है। स्पेशल सेल यह जानने का प्रयास कर रही है कि पीडीएफ कॉपी सबसे पहले किसने अपलोड की, यह फाइल किस स्रोत से बाहर आई और क्या इसमें किसी अंदरूनी व्यक्ति की भूमिका है। इसके अलावा, यह भी जांच की जा रही है कि जिन वेबसाइटों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर यह सामग्री उपलब्ध कराई गई, उन्होंने इसे किस आधार पर अपलोड या प्रचारित किया।
जनरल एम.एम. नरवणे देश के 28वें थल सेना प्रमुख रह चुके हैं और उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई अहम सैन्य और रणनीतिक निर्णयों का नेतृत्व किया। ऐसे में उनकी आत्मकथा या संस्मरण में सेना की आंतरिक कार्यप्रणाली, रणनीतिक फैसलों और संवेदनशील घटनाओं का उल्लेख होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी वजह से इस किताब को लेकर पहले से ही काफी चर्चा थी और इसके आधिकारिक प्रकाशन से पहले ही विवाद खड़ा हो जाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
सूत्रों के अनुसार, किताब के कुछ अंशों को लेकर पहले भी अनौपचारिक चर्चाएं चल रही थीं। माना जा रहा है कि यही वजह है कि किताब के लीक होने की खबर सामने आते ही दिल्ली पुलिस ने बिना देरी किए कार्रवाई शुरू की। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि लीक हुई कॉपी पूरी किताब की है या किसी प्रारंभिक ड्राफ्ट या गैली प्रूफ का हिस्सा है, जिसे आमतौर पर सीमित लोगों के साथ साझा किया जाता है।
प्रकाशन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि किसी भी किताब के प्रकाशन से पहले उसकी कई प्री-प्रिंट कॉपियां संपादन, डिजाइन और मार्केटिंग से जुड़े सीमित लोगों के पास जाती हैं। ऐसे में यह आशंका भी जताई जा रही है कि लीक किसी तकनीकी चूक या मानवीय लापरवाही का नतीजा हो सकता है। हालांकि, जांच पूरी होने से पहले किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी माना जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रकाशन जगत और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल दौर में किसी भी संवेदनशील सामग्री को पूरी तरह सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन चुका है। एक बार यदि फाइल इंटरनेट पर पहुंच जाती है, तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई और सख्त कानूनी कदम ही नुकसान को सीमित कर सकते हैं।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल अब इस मामले में तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ले रही है। साइबर फॉरेंसिक टीम यह पता लगाने में जुटी है कि पीडीएफ फाइल का मेटाडाटा क्या कहता है, इसे कब और किस डिवाइस से अपलोड किया गया और किन-किन सर्वरों के जरिए यह फैली। इसके साथ ही, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से भी जानकारी मांगी जा रही है कि किस अकाउंट से किताब से जुड़ी सामग्री अपलोड या प्रमोट की गई।
फिलहाल, जनरल मनोज नरवणे या प्रकाशक की ओर से इस मामले पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, माना जा रहा है कि जांच के नतीजों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यदि यह साबित होता है कि बिना अनुमति के किताब की सामग्री सार्वजनिक की गई, तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
यह मामला न केवल एक चर्चित किताब के लीक होने तक सीमित है, बल्कि यह इस बात की भी याद दिलाता है कि देश की सुरक्षा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के अनुभवों और विचारों को सार्वजनिक करने से पहले कितनी सतर्कता जरूरी है। दिल्ली पुलिस की जांच आने वाले दिनों में यह स्पष्ट करेगी कि यह लीक एक सुनियोजित साजिश थी या फिर सुरक्षा व्यवस्था में हुई किसी गंभीर चूक का नतीजा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

