मंडला में बंजर नदी की लूट, पर्यावरण कानूनों की खुली धज्जियां , पोकलेन से अवैध खनन पर प्रशासन कटघरे में

मंडला में बंजर नदी की लूट, पर्यावरण कानूनों की खुली धज्जियां, पोकलेन से अवैध खनन पर प्रशासन कटघरे में

प्रेषित समय :20:13:07 PM / Thu, Feb 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

कार्यालय संवाददाता, जबलपुर. 

मध्यप्रदेश के मंडला जिले में बंजर नदी को लेकर बड़ा पर्यावरणीय और कानूनी संकट सामने आया है, जहां बरबसपुर, काता और सिलगी क्षेत्र की रेत खदानों में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन किया जा रहा है. आरोप है कि खनन ठेकेदार खुलेआम नियमों की अनदेखी करते हुए पोकलेन और अन्य भारी मशीनों के जरिए नदी की धारा के भीतर गहराई तक रेत निकाल रहे हैं. यह मामला केवल अवैध खनन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसे पर्यावरण संरक्षण कानूनों का गंभीर उल्लंघन माना जा रहा है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई है.

स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि नदी में दिन-रात लगातार मशीनों से खनन किया जा रहा है. यह गतिविधि सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम 1974 तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 की धारा 14 और 15 का उल्लंघन मानी जा रही है. विशेषज्ञों के अनुसार इन कानूनों के तहत नदी के प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचाना गंभीर दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है और इसमें भारी आर्थिक दंड और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है.

खनन नियमों और सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइंस के अनुसार किसी भी नदी की धारा के भीतर पोकलेन या अन्य भारी मशीनों के उपयोग पर स्पष्ट प्रतिबंध है. इसके बावजूद यदि मशीनों से उत्खनन किया जा रहा है तो यह पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों का सीधा उल्लंघन है. आरोप है कि खनन ठेकेदार नियमों को दरकिनार करते हुए नदी की गहराई तक खुदाई कर रहे हैं, जिससे नदी की प्राकृतिक धारा प्रभावित हो रही है और जलस्तर में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है.

ग्रामीणों का कहना है कि अवैध खनन के कारण नदी का संतुलन बिगड़ रहा है और आसपास के क्षेत्रों में गंभीर पर्यावरणीय खतरे पैदा हो गए हैं. किसानों का आरोप है कि नदी किनारे की भूमि में कटाव बढ़ रहा है और उनकी कृषि योग्य जमीन धीरे-धीरे बहाव की चपेट में आ रही है. कई ग्रामीणों ने यह भी आशंका जताई है कि यदि इसी तरह खनन जारी रहा तो क्षेत्र में जल संकट और भूमि धंसने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं. इसके अलावा नदी किनारे बने पुल-पुलियों और ग्रामीण मार्गों की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है.

पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस मामले को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा है कि नदी में इस प्रकार का अवैध उत्खनन जैव विविधता को भी भारी नुकसान पहुंचाता है. नदी के भीतर रहने वाले जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाता है और जल प्रवाह का संतुलन बिगड़ जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार की गतिविधियां लंबे समय में पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका असर मानव जीवन पर भी पड़ता है.

स्थानीय लोगों ने प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद अवैध खनन पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई. ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की निष्क्रियता के कारण खनन माफिया के हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया है कि जब कानून स्पष्ट रूप से मशीनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है तो फिर खुलेआम यह अवैध कार्य कैसे जारी है.

ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि बरबसपुर, काता और सिलगी क्षेत्र की रेत खदानों में हो रहे अवैध उत्खनन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए. साथ ही पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई गई है. लोगों का कहना है कि जांच समिति गठित कर वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाए और दोषी पाए जाने पर खनन ठेकेदारों तथा संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए.

ग्रामीणों ने यह भी मांग की है कि अवैध खनन से हुए पर्यावरणीय नुकसान का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए और दोषियों पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जाए. विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के नियमों के तहत पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए दोषियों से भारी आर्थिक दंड वसूला जा सकता है. इसके अलावा भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए खनन क्षेत्रों में सख्त निगरानी व्यवस्था लागू करने की भी मांग की गई है.

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो अवैध खनन का यह नेटवर्क और मजबूत हो सकता है. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने जल्द कार्रवाई नहीं की तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे.

पर्यावरणविदों का कहना है कि नदियों में अवैध रेत खनन देशभर में एक गंभीर समस्या बन चुकी है और यह प्राकृतिक संसाधनों की लूट के समान है. उनका मानना है कि यदि इस प्रकार की गतिविधियों पर सख्ती से रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले समय में जल संसाधनों पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है.

फिलहाल बंजर नदी में अवैध खनन को लेकर मंडला जिले में आक्रोश और चिंता का माहौल बना हुआ है. स्थानीय लोगों की नजर अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है. लोगों का कहना है कि यह केवल खनन का मामला नहीं बल्कि पर्यावरण, कृषि और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है. अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले को किस तरह लेता है और क्या अवैध खनन के इस खेल पर प्रभावी रोक लग पाती है या नहीं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-