जबलपुर कोर्ट में घूसखोर पंडत फिल्म पर परिवाद दायर, नेटफ्लिक्स के कंटेंट हेड सहित अन्य को बनाया अभियुक्त

जबलपुर कोर्ट में घूसखोर पंडत फिल्म पर परिवाद दायर, नेटफ्लिक्स के कंटेंट हेड सहित अन्य को बनाया अभियुक्त

प्रेषित समय :18:32:19 PM / Sat, Feb 14th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. घूसखोर पंडत फिल्म के निर्माता नीरज पांडे और इसके ओटीटी पर प्रसारण अधिकार प्राप्त नेटफ्लिक्स के यूएसए में स्थित प्रमुख और कंटेंट हेड और नेटफ्लिक्स के भारत में वितरक के विरूद्ध आपराधिक मान हानि का परिवाद जबलपुर कोर्ट में दायर किया गया है.

न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी के समक्ष हुई प्रारम्भिक सुनवाई के बाद शुक्रवार को कोर्ट ने 20 फरवरी को परिवादी के बयान दर्ज करने के निर्देश दिए हैं. जबलपुर के स्थानीय निवासी एवं फिल्मी पटकथा लेखकए फिल्म कलाकार और ज्योतिषी पंडित वैभव पाठक ने फिल्म घूसखोर पंडत के टाइटल को ब्राह्मण समुदाय के प्रति अपमानजनक बताते हुए मानहानि का परिवाद दायर किया है. परिवाद दायर करने वाले वैभव पाठक का कहना है कि वह मध्यप्रदेश प्रगतिशील ब्राह्मण महासभा के सक्रिय सदस्य हैं. जो सम्पूर्ण मध्य प्रदेश के विप्रों की प्रतिनिधि संस्था है. जिसकी स्थापना भी पंडित मदन मोहन मालवीय ने की है.

परिवाद में आरोप लगाया गया है कि पंडित शब्द का अपभ्रंश लोक भाषा और ग्राम भाषा में पंडत प्रचलित है. किन्तु फिल्म के निर्माता ने फिल्म के शीर्षक घूसखोर पंडत के बहाने फिल्म की सस्ती और घटिया लोकप्रियता पाने के लिए गलत तरीके से प्रचार कर जानबूझकर पंडत (पंडित) उपसर्ग को प्रयोग किया है, जो इसे भ्रष्टाचार से जोड़ता है. फिल्म के टाइटल नाम से संपूर्ण ब्राह्मण समुदाय की सामाजिक प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा है. उन्होंने कहा कि कोई वैश्विक कंपनी जो भारत में व्यवसाय कर रही है. भारतीय समाज की संवेदनाओं को आघात पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.

परिवाद में नीरज पांडे फिल्म निर्माता निर्देशक, रीड हेस्टिंग्स चेयरमैन, नेटफ्लिक्स, टेड सरंदास (को-सीईओ नेटफ्लिक्स), बेला बजरिया (चीफ कंटेंट ऑफिसर नेटफ्लिक्स), मोनिका शेरगिल कंटेंट हेड, नेटफ्लिक्स इंडिया को अभियुक्त बनाया गया है. सुनवाई के दौरान कोर्ट में तर्क दिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना फिल्म का शीर्षक ब्राह्मण समुदाय के प्रति अपमानजनक है.

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता असीम त्रिवेदी एआर के दीक्षित ने तर्क दिया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उक्त फि़ल्म के शीर्षक को अपमानजनक माना है और निर्माता को शीर्षक बदलने कहा है. परंतु अभी तक ट्रेलरों, समाचार-पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से इस शीर्षक का ऐसा व्यापक प्रचार हो चुका है और प्रतिष्ठा-हानि का अपराध पूर्णतया घटित हो चुका है. यह भी तर्क दिया कि शीर्षक बदला जा सकता है. लेकिन शब्दों के समाज के मानस पर बने घाव नहीं मिटते और प्रतिष्ठा की क्षति की भी भरपाई नहीं की जा सकती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-