जलवायु परिवर्तन की मार से संकट में पशुपालन का भविष्य, चरागाह और मवेशियों की दुनिया पर मंडराया अस्तित्व का खतरा

जलवायु परिवर्तन की मार से संकट में पशुपालन का भविष्य, चरागाह और मवेशियों की दुनिया पर मंडराया अस्तित्व का खतरा

प्रेषित समय :20:30:10 PM / Thu, Feb 19th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. प्रकृति और मनुष्य के बीच सदियों से चले आ रहे संतुलन पर अब आधुनिक युग के बढ़ते तापमान की काली छाया पड़ती दिखाई दे रही है। जर्मनी के प्रतिष्ठित पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च (PIK) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक हालिया और चौंकाने वाले अध्ययन ने दुनिया भर के पशुपालकों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। इस शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि यदि वैश्विक उत्सर्जन और तापमान में बढ़ोतरी की रफ्तार इसी तरह जारी रही, तो इस सदी के अंत तक दुनिया के लगभग 36 से 50 प्रतिशत चरागाह अपनी उपयोगिता पूरी तरह खो सकते हैं। प्रतिष्ठित जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' (PNAS) में प्रकाशित यह रिपोर्ट स्पष्ट चेतावनी देती है कि चरागाहों का वह "सुरक्षित जलवायु दायरा" जिसमें मवेशी, भेड़ और बकरियां पनपती हैं, अब तेजी से सिकुड़ रहा है। यह संकट केवल घास के मैदानों के सूखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य उत्पादन प्रणालियों में से एक के ढहने का संकेत है, जो वर्तमान में पृथ्वी की लगभग एक तिहाई सतह पर फैली हुई है।

राजस्थान के किसी दूरदराज गांव की उस सुबह की कल्पना कीजिए, जहां एक चरवाहा अपनी उम्मीदों और मवेशियों के साथ घर से निकलता है, लेकिन उसे वहां वह हरियाली नहीं मिलती जो उसके पूर्वजों के समय हुआ करती थी। हवा में नमी कम हो रही है, धूप की तपिश खाल जलाने लगी है और घास अब पहले जैसी घनी नहीं रही। वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को आंकड़ों के जरिए समझाने की कोशिश की है। उनके अनुसार, मवेशियों के स्वास्थ्य और चराई के लिए एक विशिष्ट प्राकृतिक संतुलन की आवश्यकता होती है, जिसमें तापमान का दायरा -3 से 29 डिग्री सेल्सियस के बीच होना चाहिए। इसके साथ ही सालाना वर्षा, आर्द्रता और हवा की रफ्तार का एक निश्चित अनुपात ही चरागाहों को जीवित रखता है। शोध बताता है कि जैसे ही यह संतुलन बिगड़ता है, घास का पोषण खत्म होने लगता है और मवेशियों के लिए जीवित रहना कठिन हो जाता है। अध्ययन के डरावने आंकड़े बताते हैं कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए तत्काल कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो साल 2100 तक दुनिया भर के लगभग 1.6 अरब मवेशी और 100 मिलियन से अधिक पशुपालक सीधे तौर पर प्रभावित होंगे।

इस जलवायु संकट का सबसे भीषण प्रहार अफ्रीका महाद्वीप पर होने की आशंका जताई गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में भी अफ्रीका के 16 प्रतिशत चरागाह क्षेत्र घट सकते हैं, लेकिन अगर जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध इस्तेमाल जारी रहा, तो यह गिरावट 65 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। अफ्रीका के कई हिस्सों में तापमान पहले ही अपने सुरक्षित सीमा के उच्चतम स्तर पर है। इथियोपियाई हाईलैंड्स, ईस्ट अफ्रीकन रिफ्ट वैली और कालाहारी बेसिन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र अब दक्षिण की ओर खिसकने को मजबूर हैं। लेकिन यहाँ एक भौगोलिक विडंबना यह है कि अफ्रीका की सीमा दक्षिण में समुद्र पर जाकर समाप्त हो जाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि जैसे-जैसे तापमान की बेल्ट आगे बढ़ेगी, मवेशियों के लिए जमीन खत्म हो जाएगी और उनके पास जाने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचेगा। यह स्थिति केवल पशुओं के लिए ही नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों के लिए भी विनाशकारी होगी जिनकी पूरी आजीविका और खाद्य सुरक्षा इन मवेशियों पर टिकी है।

शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में एक कड़वा सच यह भी साझा किया है कि अब तक अपनाए जाने वाले पारंपरिक उपाय इस बड़े संकट के सामने बौने साबित होंगे। आमतौर पर चरवाहे चारे की कमी होने पर पशुओं की प्रजाति बदल देते हैं या अपने झुंड को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं, जिसे 'माइग्रेशन' कहा जाता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन की वर्तमान गति इतनी तेज और व्यापक है कि ये पुराने तरीके अब पर्याप्त नहीं होंगे। बदलाव इतने बड़े स्तर पर हो रहे हैं कि समुदायों के पास संभलने का समय ही नहीं बचेगा। इसका असर सिर्फ दूध या मांस की कीमतों में बढ़ोतरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह उन देशों में सामाजिक अस्थिरता और संघर्ष का कारण बन सकता है जो पहले से ही आर्थिक तंगी, भूख और लैंगिक असमानता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। जब चरागाह खत्म होंगे, तो संसाधनों के लिए जंग छिड़ेगी, जिससे वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए एक नया खतरा पैदा हो जाएगा।

वैज्ञानिकों का निष्कर्ष बिल्कुल साफ और सीधा है कि इस प्रलयकारी स्थिति से बचने का एकमात्र प्रभावी तरीका जीवाश्म ईंधन से तेजी से दूरी बनाना है। जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए किए जाने वाले वैश्विक प्रयास ही पशुपालन के भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं। चरागाह केवल घास के मैदान नहीं होते, बल्कि वे एक समृद्ध जीवन पद्धति, संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं का आधार हैं। अगर तापमान की रेखा इसी तरह ऊपर की ओर बढ़ती रही, तो कई समुदायों के पैरों के नीचे से जमीन सिर्फ सूखेगी नहीं, बल्कि वह हमेशा के लिए गायब हो जाएगी। यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ अब उस मोड़ पर पहुंच गया है जहाँ से वापसी का रास्ता केवल और केवल पर्यावरण संरक्षण और सख्त वैश्विक नीतियों के क्रियान्वयन से ही होकर गुजरता है। समय तेजी से निकल रहा है और अगर आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य की पीढ़ियों के पास न तो चरागाह बचेंगे और न ही वह पशुधन जो मानव सभ्यता के विकास का आधार रहा है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-