जबलपुर. मध्य प्रदेश में पेड़ों की कटाई को लेकर चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पूरे प्रदेश में बिना विधिवत अनुमति के पेड़ों की कटाई पर लगी रोक प्रभावी रहेगी. बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि यदि अदालत के आदेश का उल्लंघन कर कहीं भी अवैध कटाई होती है तो संबंधित पक्षों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है.
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से दलील दी गई कि मामला वर्तमान में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के विचाराधीन है. जहां 9 मार्च को सुनवाई होनी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि पेड़ों की कटाई की निगरानी के लिए गठित कमेटी एनजीटी के अधिकार क्षेत्र में आती है. इसलिए उल्लंघन से जुड़े तथ्य वहां रखे जा सकते हैं. हालांकिए हाईकोर्ट ने अपनी ओर से रोक को बरकरार रखते हुए आगामी 18 मार्च 2025 की तारीख तय की है. हस्तक्षेपकर्ता अधिवक्ता हरप्रीत गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि रोक के बावजूद प्रदेश में 4000 से अधिक पेड़ों को काटने की अनुमति दी जा चुकी है.
उन्होंने चिंता जताई कि जब तक एनजीटी नई नीति तैयार करेगी तब तक विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर हरियाली को नुकसान पहुंचाया जा चुका होगा. इसी गंभीर आशंका को देखते हुए अब याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से कोर्ट के आदेश की अवहेलना पर कंटेंप्ट पिटीशन दायर करने की तैयारी की जा रही है. पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे की जनहित याचिका के अनुसार पिछले 5 वर्षों में मध्य प्रदेश ने अपना 408 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र खो दिया है. वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने महू-खंडवा गेज परिवर्तन जैसी परियोजनाओं का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे विकास कार्यों के नाम पर पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है. हाईकोर्ट ने इन सभी चिंताओं को संज्ञान में लेते हुए जनहित याचिका को स्वत: संज्ञान मामले के साथ जोड़ दिया है.
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