यूजर डेटा साझा करने का आरोप सही नहीं, व्हाट्सएप ने सुप्रीम कोर्ट में दी सफाई

यूजर डेटा साझा करने का आरोप सही नहीं, व्हाट्सएप ने सुप्रीम कोर्ट में दी सफाई

प्रेषित समय :21:35:52 PM / Mon, Feb 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. इंस्टेंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि यह कहना “पूरी तरह सही नहीं” है कि कंपनी अपने यूजर्स का डेटा अन्य मेटा प्लेटफॉर्म्स के साथ साझा कर रही है. कंपनी ने शीर्ष अदालत को भरोसा दिलाया कि वह यूजर प्राइवेसी को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और कानून का किसी भी प्रकार से उल्लंघन करने का प्रश्न ही नहीं उठता.

यह बयान उस समय सामने आया जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष व्हाट्सएप और उसकी मूल कंपनी मेटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें पेश कीं. सुनवाई उस मामले से जुड़ी है जिसमें राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) द्वारा यूजर डेटा साझा करने के मुद्दे पर लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने और निर्देशों को चुनौती दी गई है.

कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि व्हाट्सएप की तकनीकी संरचना बेहद स्पष्ट है और इसमें गोपनीयता को सर्वोच्च महत्व दिया गया है. उन्होंने कहा, “कानून का उल्लंघन करने का कोई सवाल ही नहीं है.” सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि व्हाट्सएप की सेवाओं में एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन जैसी तकनीकें लागू हैं, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि संदेशों की सामग्री न तो कंपनी पढ़ सकती है और न ही किसी अन्य प्लेटफॉर्म के साथ साझा कर सकती है.

मामले की पृष्ठभूमि में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) का वह आदेश है, जिसमें कहा गया था कि व्हाट्सएप की नई गोपनीयता नीति के तहत यूजर्स को मैसेजिंग सेवा का उपयोग जारी रखने के लिए डेटा साझा करने के लिए मजबूर किया गया. आयोग ने इसे प्रतिस्पर्धा कानून के उल्लंघन के रूप में देखा और कंपनी पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया. साथ ही, यूजर की स्पष्ट सहमति के बिना डेटा साझा न करने के निर्देश भी दिए गए थे.

व्हाट्सएप और मेटा ने इस आदेश को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण में चुनौती दी थी. एनसीएलएटी ने कुछ शर्तों के साथ राहत दी, लेकिन यूजर की सहमति से संबंधित निर्देशों को बरकरार रखा. अब दोनों कंपनियों ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया है.

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी जानना चाहा कि कंपनी की डेटा शेयरिंग नीति व्यवहार में कैसे लागू होती है और क्या यूजर्स को वास्तव में विकल्प दिया जाता है. पीठ ने संकेत दिया कि डिजिटल युग में डेटा संरक्षण और प्रतिस्पर्धा कानून के बीच संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण प्रश्न है.

कंपनी की ओर से कहा गया कि व्हाट्सएप और मेटा के अन्य प्लेटफॉर्म्स, जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम, के बीच सीमित और नियामकीय दायरे में ही डेटा का उपयोग होता है. सिब्बल ने जोर देकर कहा कि मैसेज की सामग्री साझा नहीं की जाती और केवल कुछ तकनीकी या व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए आवश्यक जानकारी ही, वह भी नियमों के तहत, संसाधित की जाती है.

दूसरी ओर, प्रतिस्पर्धा आयोग की ओर से दलील दी गई कि डिजिटल बाजार में व्हाट्सएप की मजबूत स्थिति का लाभ उठाते हुए यूजर्स पर शर्तें थोपी गईं. आयोग का कहना है कि सेवा तक निरंतर पहुंच के लिए गोपनीयता नीति को स्वीकार करना अनिवार्य बनाया गया, जिससे उपभोक्ताओं के पास वास्तविक विकल्प नहीं बचा.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक कंपनी या जुर्माने तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में डेटा संरक्षण, डिजिटल प्रतिस्पर्धा और टेक कंपनियों की जवाबदेही से जुड़े व्यापक मुद्दों को छूता है. सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला भविष्य में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की नीतियों और नियामकीय ढांचे को दिशा दे सकता है.

सुनवाई के दौरान व्हाट्सएप ने यह भी आश्वासन दिया कि वह एनसीएलएटी के यूजर सहमति से संबंधित निर्देशों का पूरी तरह पालन करेगा. कंपनी ने कहा कि वह पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन के प्रति प्रतिबद्ध है.

मामले की आगे की सुनवाई तय तिथि पर जारी रहेगी. फिलहाल, शीर्ष अदालत में हुई इस बहस ने डिजिटल प्राइवेसी और प्रतिस्पर्धा कानून के बीच संतुलन पर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को तेज कर दिया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-