जबलपुर. मध्य प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने जबलपुर सहित पूरे प्रदेश में चिंता की स्थिति पैदा कर दी है. भोपाल में विधानसभा के भीतर प्रस्तुत किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले छह वर्षों में राज्य भर में 2 लाख 74 हजार से अधिक महिलाएं और बालिकाएं लापता दर्ज की गई हैं. औसतन प्रतिदिन लगभग 130 महिलाओं और लड़कियों के गायब होने के मामले सामने आए हैं. जबलपुर जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों में भी बड़ी संख्या में प्रकरण दर्ज होना स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है.
विधानसभा में कांग्रेस विधायक विक्रम भूरिया द्वारा उठाए गए प्रश्न के लिखित उत्तर में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि वर्ष 2020 से 28 जनवरी 2026 तक कुल 2,74,311 महिलाएं और बालिकाएं लापता दर्ज की गई हैं. औसतन हर वर्ष लगभग 45 हजार मामलों का पंजीयन हुआ. लगातार छह वर्षों तक प्रतिदिन करीब 130 महिलाओं और बालिकाओं का लापता होना प्रदेश की कानून व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
राज्य सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार बड़ी संख्या में मामलों में महिलाओं और बच्चों को खोज लिया गया है, लेकिन अब भी हजारों महिलाएं ऐसी हैं जिनका कोई पता नहीं चल सका है. इन लंबित मामलों ने परिवारों की चिंता और पीड़ा को और बढ़ा दिया है. कई परिवार वर्षों से अपने प्रियजनों की तलाश में प्रयासरत हैं, लेकिन उन्हें ठोस सफलता नहीं मिल पाई है.
जबलपुर, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और उज्जैन जैसे बड़े शहरों में सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए हैं. जबलपुर में लगातार बढ़ते गुमशुदगी के प्रकरण स्थानीय प्रशासन के लिए भी चुनौती बने हुए हैं. वहीं कई आदिवासी जिलों से भी चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं, जो यह संकेत देते हैं कि समस्या केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मानव तस्करी, घरेलू हिंसा, पारिवारिक विवाद, आर्थिक दबाव और जागरूकता की कमी जैसे कई कारक इन मामलों के पीछे हो सकते हैं.
मुख्यमंत्री ने अपने उत्तर में स्वीकार किया कि हजारों महिलाओं का लापता होना केवल सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि इस प्रकार के मामलों में उच्च स्तर पर जवाबदेही तय करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है. सरकार ने खोज और ट्रैकिंग प्रणाली को और सुदृढ़ करने का आश्वासन दिया है.
जबलपुर में भी इस मुद्दे को लेकर नागरिकों और सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा तेज हो गई है. महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस रणनीति, तेज जांच प्रक्रिया और प्रभावी रोकथाम उपायों की मांग उठ रही है. लगातार सामने आ रहे आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

