होर्मुज़ पर संकट की आहट एशिया की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक तेल बाजार पर मंडराया बड़ा खतरा

होर्मुज़ पर संकट की आहट एशिया की ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक तेल बाजार पर मंडराया बड़ा खतरा

प्रेषित समय :19:14:17 PM / Tue, Mar 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

दुनिया की ऊर्जा राजनीति कई बार भूगोल की एक पतली रेखा पर टिक जाती है. पश्चिम एशिया में स्थित Strait of Hormuz ऐसी ही एक सामरिक जलधारा है, जिसकी चौड़ाई कुछ हिस्सों में महज़ दो मील है, लेकिन रणनीतिक महत्व वैश्विक है. यही संकरा समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की आपूर्ति का रास्ता है. यदि यहां किसी प्रकार का अवरोध पैदा होता है, तो उसका असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ना तय है.

हाल में जारी Zero Carbon Analytics की एक ब्रीफिंग ने इस जलडमरूमध्य को लेकर संभावित जोखिमों की गंभीर तस्वीर पेश की है. विश्लेषण के अनुसार यदि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है और ईरान इस मार्ग को अवरुद्ध करता है, तो इसका सबसे बड़ा झटका एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को लगेगा. 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, इस जलमार्ग से गुजरने वाले 84 प्रतिशत तेल और 83 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति एशियाई देशों तक पहुंची.

इनमें चार प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं—चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया—कुल तेल प्रवाह का लगभग 75 प्रतिशत और एलएनजी का 59 प्रतिशत उपभोग करती हैं. इससे साफ है कि होर्मुज़ में किसी भी तरह की बाधा एशिया की औद्योगिक गतिविधियों, बिजली उत्पादन और परिवहन क्षेत्र पर सीधा प्रभाव डाल सकती है.

जोखिम विश्लेषण के आधार पर सबसे संवेदनशील स्थिति जापान की बताई गई है. उसकी कुल ऊर्जा खपत का लगभग 87 प्रतिशत आयातित जीवाश्म ईंधनों से आता है. दक्षिण कोरिया में यह आंकड़ा 81 प्रतिशत है. इसके मुकाबले चीन की आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता करीब 20 प्रतिशत और भारत की लगभग 35 प्रतिशत है. इस आधार पर तैयार जोखिम सूचकांक में जापान सबसे ऊपर, उसके बाद दक्षिण कोरिया, फिर भारत और चीन का स्थान है.

यदि होर्मुज़ में बड़ा अवरोध पैदा होता है, तो वैश्विक तेल बाजार में तेज उछाल आ सकता है. विश्लेषण के अनुसार कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जो 2007-08 के ऐतिहासिक उच्च स्तर के बराबर होगा. इराक के उप प्रधानमंत्री ने तो आशंका जताई है कि हालात बिगड़ने पर कीमतें 200 से 300 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकती हैं. 25 फरवरी 2026 तक Brent Crude की कीमत 71.40 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच चुकी थी, जो 2025 के अंत की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक है.

तेल के साथ-साथ गैस बाजार पर भी गहरा असर पड़ सकता है. Oxford Institute for Energy Studies के अनुसार यदि यह जलमार्ग एक वर्ष के लिए बंद हो जाता है, तो वैश्विक एलएनजी आपूर्ति में 15 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. जापान में एलएनजी की कीमतें 170 प्रतिशत तक बढ़ने की आशंका जताई गई है.

ऊर्जा कीमतों में उछाल का सीधा असर घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ता है. 2022 के ऊर्जा संकट के दौरान, जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक गैस बाजार में अस्थिरता आई थी, तब जापान में घरेलू बिजली बिल औसतन 25.8 प्रतिशत तक बढ़ गए थे. सरकार को उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बड़े वित्तीय पैकेज की घोषणा करनी पड़ी थी. इस अनुभव ने दिखा दिया कि आयातित जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता किस तरह आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है.

यह संकट केवल आपूर्ति का सवाल नहीं है, बल्कि व्यापक जलवायु और आर्थिक रणनीति से भी जुड़ा है. जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं भू-राजनीतिक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील रहती हैं. यही कारण है कि ब्रीफिंग में नवीकरणीय ऊर्जा और विद्युतीकरण को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा का समाधान बताया गया है.

यूरोप का उदाहरण इस संदर्भ में उल्लेखनीय है. 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने गैस आयात में उल्लेखनीय कमी की. 2021 में 361.5 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस आयात से घटकर 2025 में यह आंकड़ा 313.5 बिलियन क्यूबिक मीटर रह गया. फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने गैस खपत में दो अंकों की गिरावट दर्ज की. यह बदलाव ऊर्जा दक्षता, वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के कारण संभव हुआ.

जापान की स्थिति विशेष रूप से जटिल है. 2011 की फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद उसने परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता घटा दी और बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी बढ़ गई. 2024 तक उसके पावर ग्रिड में जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी 68.8 प्रतिशत हो चुकी थी. हालांकि 2025 में जारी सातवीं सामरिक ऊर्जा योजना 2040 तक नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा 50 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखती है, फिर भी 30 से 40 प्रतिशत बिजली उत्पादन आयातित जीवाश्म ईंधनों पर आधारित रहने की संभावना है.

हालांकि सकारात्मक संकेत भी मौजूद हैं. 2014 से 2023 के बीच जापान में यूटिलिटी-स्केल सोलर ऊर्जा की लागत 80 प्रतिशत से अधिक घटकर 9.9 येन प्रति किलोवाट घंटा हो गई है, जो एलएनजी आधारित बिजली उत्पादन की तुलना में काफी सस्ती है. अनुमान है कि 2050 तक 140 गीगावॉट पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित करने से लगभग 3.55 लाख नए रोजगार सृजित हो सकते हैं.

स्पष्ट है कि होर्मुज़ का यह ‘चोकपॉइंट’ केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा तंत्र की नाजुकता का प्रतीक है. एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तेज रफ्तार विकास यात्रा इस पतली जलधारा पर निर्भर है. यदि यहां संकट गहराता है, तो तेल और गैस की कीमतों में उछाल, मुद्रास्फीति में वृद्धि और औद्योगिक उत्पादन पर दबाव जैसे व्यापक आर्थिक प्रभाव सामने आ सकते हैं.

यह परिदृश्य यह भी बताता है कि ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु कार्रवाई को अलग-अलग खानों में नहीं रखा जा सकता. स्वच्छ ऊर्जा में निवेश केवल उत्सर्जन घटाने की रणनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी आधार बन सकता है. होर्मुज़ की संकरी धारा दुनिया को यह याद दिला रही है कि भविष्य की स्थिरता के लिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ी से बढ़ना अब विकल्प नहीं, आवश्यकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-