- हेमेन्द्र क्षीरसागर,
जब बच्चे का जन्म होता है तो बच्चे का पूर्ण विकास माता-पिता की देखरेख में ही होता है. फिर धीरे-धीरे समाज और स्कूली शिक्षा से बच्चा किशोरावस्था में आ जाता है. फिर वैवाहिक जीवन को प्राप्त करता है. शादी के बाद संतान की उत्पत्ति होना स्वाभाविक है. जब हम एक नई पीढ़ी को जन्म देते हैं तो यह हमारा कर्तव्य हो जाता है कि बच्चे में आदर्श गुण हों यह तभी संभव है. जब पति-पत्नी, परिवार के विचार आदर्श और श्रेष्ठ हो.
जैसा कि आप जानते हैं कि जिस प्रकार का हमारा चरित्र होगा वैसा ही बच्चे हमसे सीखेंगे. इसलिए हमें अपने जीवन में बुराइयों से दूर रहना चाहिए. जो शब्द दूसरों को कष्ट पहुंचाए उन शब्दों का त्याग करना बहुत आवश्यक है. हमें ऐसे शब्दों की आवश्यकता है जो सुनने में दूसरों को अच्छा लगे. हमारे दिल को भी सुकून दे. जीवन में धूम्रपान, चरस, अफीम और शराब जैसे नशीले पदार्थों का सेवन न करें. ये हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाते है. दिमाग की सोचने-समझने की क्षमता को कम कर देते हैं. जिससे छोटी-छोटी गलतियां भी बड़ा अपराध बन जाती हैं. इसके साथ ही हमें अश्लील हरकतों से भी दूर रहना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीना चाहिए. तभी हम आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार दे पाएंगे.
अक्सर समाज में कई लोग एक-दूसरे को ठेस पहुँचाते हैं. लेकिन जिसे ठेस पहुंचती है अगर वे उन बातों को छिपाते हैं. किसी को नहीं बताते हैं, तो यह तनाव का कारण बन जाता है. फिर ऐसा व्यक्ति तनाव में रहने लगता है. मन में हमेशा नकारात्मक बातों से घिरा रहता है. वह मानसिक अवसाद के दौर से गुजरता है. जिसमें व्यक्ति उदास रहता है और जीवन से हार मानने लगता है. वहीं यदि किसी को बता दिया जाए तो उसका समाधान निश्चित होता है. जिससे व्यक्ति का आत्म विकास होने लगता है. यदि आप इस गुण को अपने में धारण करते हैं तो आप आने वाली पीढ़ी को भी आत्म-विकास का यह गुण प्रदान करते हैं. जिससे बच्चों के जीवन का विकास होता है.
बच्चों को अच्छे संस्कार देने में माता-पिता की भूमिका सबसे अहम होती है. खासकर बेटियों में शालीनता एवं आचरण, जैसे संस्कार सिर्फ मां ही दे सकती है. इसलिए मां का श्रेष्ठ और आदर्श चरित्र होना बहुत जरूरी है. मां के व्यवहार की छाप बेटियों पर पड़ती है. पिता का व्यवहार श्रेष्ठ एवं उत्तम होना चाहिए. तभी वह अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे पाएंगे. क्योंकि जैसा माहौल होता है. बच्चे वैसा ही संस्कार सीखते हैं. वैसा ही संस्कार उनमें समाहित हो जाते हैं. इसलिए बहुत जरूरी है कि अपनी आदतों को अच्छा रखा जाए. यदि पिता अपने सभी अवगुणों को दूर कर अच्छे विचारों और अच्छी आदतों को अपनाए तो वह घर में अच्छे संस्कार दे सकते हैं. जब हम अच्छे रास्ते पर चलेंगे तभी हम कल्पना कर सकते हैं कि हमारे बच्चे भी अच्छे रास्ते पर चलेंगे.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

