नई दिल्ली. बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. एक समय ऐसा था जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी National Democratic Alliance में Janata Dal (United) प्रमुख ताकत हुआ करती थी और Bharatiya Janata Party उसका सहयोगी दल माना जाता था. लेकिन समय के साथ राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं और अब बिहार में एनडीए के भीतर बीजेपी सबसे प्रभावशाली दल बनकर उभरी है, जबकि जेडीयू की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हो गई है.
हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद इस बदलाव को और स्पष्ट माना जा रहा है. बताया जा रहा है कि आने वाले समय में पहली बार बिहार में बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री बन सकता है. यह स्थिति जेडीयू के लिए राजनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है क्योंकि लंबे समय तक राज्य की राजनीति में उसकी केंद्रीय भूमिका रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस बदलाव की शुरुआत कई साल पहले ही हो चुकी थी. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर में एनडीए की राजनीति गठबंधन धर्म पर आधारित थी. उस समय क्षेत्रीय दलों की भूमिका बहुत मजबूत थी और बीजेपी को कई राज्यों में सहयोगी दलों के साथ मिलकर काम करना पड़ता था. बिहार में भी जेडीयू पिछड़ी जातियों के समर्थन के कारण गठबंधन की प्रमुख शक्ति थी जबकि बीजेपी को ऊंची जातियों, व्यापारियों और शहरी वोटरों का समर्थन मिलता था.
2005 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने Rashtriya Janata Dal के लंबे शासन को समाप्त कर दिया था. उस चुनाव में जेडीयू को 88 सीटें और बीजेपी को 55 सीटें मिली थीं. इसके बाद 2010 के चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटें जीतकर अपनी स्थिति और मजबूत कर ली जबकि बीजेपी को 91 सीटें मिली थीं. उस दौर में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की छवि विकास और सुशासन के नेता के रूप में स्थापित हो चुकी थी.
हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव के समय एक बड़ा राजनीतिक मोड़ आया जब नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने का विरोध करते हुए एनडीए से अलग होने का फैसला किया. उस चुनाव में जेडीयू को भारी नुकसान हुआ और उसे बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से केवल दो सीटें ही मिल पाईं. वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने 31 सीटों पर जीत हासिल की और बीजेपी अकेले 22 सीटें जीतने में सफल रही. इस परिणाम ने यह संकेत दिया कि बिहार में बीजेपी का स्वतंत्र राजनीतिक आधार तेजी से मजबूत हो रहा है.
2015 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया और बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया. हालांकि उस चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर सबसे ज्यादा रहा और वह 53 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इससे यह स्पष्ट हो गया कि बीजेपी का जनाधार मजबूत हो चुका है, लेकिन उसे बहुमत के लिए व्यापक सामाजिक गठबंधन की जरूरत अभी भी थी.
2017 में नीतीश कुमार फिर से एनडीए में शामिल हो गए और बीजेपी के साथ सरकार बना ली. इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बीजेपी ने जेडीयू को सीटों के मामले में पीछे छोड़ दिया. उस चुनाव में बीजेपी को 74 सीटें मिलीं जबकि जेडीयू केवल 43 सीटों पर सिमट गई. इसके बावजूद मुख्यमंत्री का पद नीतीश कुमार के पास ही रहा.
2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 202 सीटें जीतकर बड़ी जीत हासिल की. इस चुनाव में बीजेपी को 89 सीटें और जेडीयू को 85 सीटें मिलीं. हालांकि सीटों के लिहाज से दोनों दल लगभग बराबर थे, लेकिन गठबंधन के भीतर निर्णय लेने की शक्ति अब बीजेपी के हाथों में अधिक दिखाई देने लगी. सरकार बनने के बाद गृह विभाग भी बीजेपी को दे दिया गया, जो पहले हमेशा नीतीश कुमार के पास रहता था.
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में बीजेपी के उदय के पीछे मजबूत संगठन और सामाजिक विस्तार की रणनीति भी एक बड़ा कारण है. पार्टी ने पिछले दस वर्षों में गैर-यादव पिछड़ी जातियों और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की है. इसके तहत पार्टी ने कई नए नेताओं को आगे बढ़ाया है, जिनमें Samrat Choudhary और Nityanand Rai जैसे नाम प्रमुख हैं.
इसके अलावा केंद्रीय नेतृत्व के मजबूत संगठनात्मक ढांचे और चुनावी संसाधनों ने भी बीजेपी को बढ़त दिलाने में मदद की है. केंद्र में सत्ता में होने के कारण पार्टी के पास वित्तीय और प्रचार संसाधन भी अधिक हैं, जिससे क्षेत्रीय दलों के मुकाबले उसकी चुनावी क्षमता बढ़ जाती है.
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बिहार में बीजेपी के सामने अभी भी कुछ चुनौतियां मौजूद हैं. पार्टी के पास अभी तक ऐसा स्थानीय नेता नहीं है जो नीतीश कुमार की तरह विभिन्न जातियों और सामाजिक समूहों में व्यापक स्वीकार्यता रखता हो. इसके अलावा राज्य में Rashtriya Janata Dal जैसे मजबूत विपक्षी दल भी मौजूद हैं, जो चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं.
जेडीयू के भविष्य को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर भविष्य में जेडीयू कमजोर होती है तो उसके कई नेता बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जेडीयू की अलग क्षेत्रीय पहचान अभी भी एनडीए के लिए फायदेमंद है क्योंकि इससे गठबंधन को ऐसे सामाजिक वर्गों में समर्थन मिलता है जो सीधे बीजेपी के साथ नहीं जुड़ते.
कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में बीजेपी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और एनडीए के भीतर उसकी स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है. लेकिन आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी राज्य में पूरी तरह स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बन पाती है या फिर उसे गठबंधन की राजनीति के सहारे ही आगे बढ़ना पड़ता है. साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जेडीयू बदलते राजनीतिक माहौल में अपनी भूमिका और पहचान को किस तरह बनाए रखती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

