बड़े शहरों की हवा में बढ़ता जहरीला प्रदूषण अब सिर्फ धुआँ नहीं मौसम की बदलती परिस्थितियाँ भी बन रही बड़ी वजह

बड़े शहरों की हवा में बढ़ता जहरीला प्रदूषण अब सिर्फ धुआँ नहीं मौसम की बदलती परिस्थितियाँ भी बन रही बड़ी वजह

प्रेषित समय :19:22:40 PM / Wed, Mar 11th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली। देश के बड़े शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को अक्सर केवल धुआँ और उत्सर्जन से जोड़कर देखा जाता है। आम तौर पर माना जाता है कि गाड़ियों का धुआँ, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण और कचरा जलाने जैसी गतिविधियां ही शहरों की हवा को जहरीला बना रही हैं। लेकिन एक नई अध्ययन रिपोर्ट इस धारणा को आंशिक बताते हुए कहती है कि भारत के कई शहरों में हवा की खराब गुणवत्ता के पीछे मौसम की स्थितियाँ भी उतनी ही बड़ी भूमिका निभाती हैं। पर्यावरण शोध संस्था Climate Trends की हालिया रिपोर्ट के अनुसार कई शहरों में मौसम के कारण प्रदूषण का स्तर लगभग 40 प्रतिशत तक ऊपर या नीचे जा सकता है, भले ही प्रदूषण के स्रोतों में कोई खास बदलाव न हुआ हो।

रिपोर्ट में बताया गया है कि किसी शहर की हवा केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितना प्रदूषण पैदा हो रहा है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि मौसम उस प्रदूषण को फैलने देता है या उसे शहर के ऊपर ही रोक कर रखता है। जब हवा की गति बेहद कम होती है और वातावरण में नमी अधिक रहती है, तब प्रदूषक कण हवा में फैल नहीं पाते और एक जगह जमा होने लगते हैं। इससे शहरों के ऊपर प्रदूषण की एक परत बन जाती है और लोगों को लंबे समय तक जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर होना पड़ता है। अध्ययन में वर्ष 2024 से 2025 के बीच के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वायु गुणवत्ता आंकड़ों पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार उत्सर्जन और मौसम के इस मेल को समझे बिना वायु प्रदूषण की वास्तविक स्थिति का आकलन करना मुश्किल है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि देश की राजधानी नई दिल्ली अभी भी देश के सबसे गंभीर वायु प्रदूषण संकट वाले शहरों में शामिल है। यहां सालाना औसत पीएम 2.5 का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया है। सर्दियों के मौसम में स्थिति और ज्यादा खराब हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक सर्दियों के महीनों में दिल्ली में एक भी ऐसा दिन दर्ज नहीं हुआ जिसे “क्लीन एयर डे” कहा जा सके। इसका मतलब यह है कि पूरे सर्दियों के दौरान हवा का स्तर सुरक्षित श्रेणी तक नहीं पहुंच पाया। यही कारण है कि कई बार सालाना औसत प्रदूषण के आंकड़ों में थोड़ा सुधार दिखाई देता है, लेकिन लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में इसका लाभ महसूस नहीं होता।

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली और पटना जैसे शहरों में सर्दियों के दौरान लगभग 70 प्रतिशत से अधिक दिनों में मौसम की ऐसी स्थिति बनती है जिसमें हवा की गति कम और नमी ज्यादा होती है। ऐसी परिस्थिति में हवा में ठहराव पैदा हो जाता है, जिससे प्रदूषण के कण लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं। इस वजह से शहरों के ऊपर धुंध और स्मॉग की मोटी परत छाई रहती है। Climate Trends की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला का कहना है कि अगर सालाना पीएम 2.5 स्तर में 20 से 30 प्रतिशत की कमी भी आ जाए, तब भी इसका मतलब यह नहीं कि सर्दियों में हवा सुरक्षित हो जाएगी। उनके अनुसार दिल्ली और पटना जैसे शहरों में मौसम की वजह से प्रदूषण लंबे समय तक जमा रहता है और इसलिए आने वाले चरणों में वायु गुणवत्ता सुधार कार्यक्रमों में मौसम को ध्यान में रखना जरूरी है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि पटना देश के सबसे प्रदूषित शहरों में तेजी से उभर रहा है और कई मामलों में यह दूसरे स्थान पर पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा के मैदानों में बसे कई शहरों की भौगोलिक स्थिति भी प्रदूषण को बढ़ाने में भूमिका निभाती है। यहां हवा का प्रवाह अपेक्षाकृत धीमा होता है और मैदानों में प्रदूषक कणों के फैलने की क्षमता सीमित रहती है। ऐसे में प्रदूषण दूर जाने के बजाय शहरों के ऊपर ही अटक जाता है और लोगों को लगातार खराब हवा का सामना करना पड़ता है।

रिपोर्ट में दक्षिण भारत के शहरों को लेकर भी एक नया रुझान सामने आया है। परंपरागत रूप से अपेक्षाकृत साफ हवा वाले शहर माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई में भी अब सर्दियों के महीनों में हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के संकेत मिलने लगे हैं। इसे विशेषज्ञ एक नए ट्रेंड के रूप में देख रहे हैं। इसके अलावा मुंबई और चेन्नई में वर्ष 2025 के दौरान सालाना औसत प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रदूषण अब केवल कुछ महीनों तक सीमित रहने वाली समस्या नहीं रह गया है, बल्कि साल भर अलग-अलग स्तरों पर मौजूद रहता है।

हालांकि बड़े शहरों के बीच बेंगलुरु अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां हवा की गुणवत्ता अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है और शोधकर्ता इसे “संरचनात्मक वायु गुणवत्ता सहनशीलता” का उदाहरण मानते हैं। इसका मतलब यह है कि शहर की भौगोलिक संरचना और मौसमीय परिस्थितियां प्रदूषण को कुछ हद तक नियंत्रित रखने में मदद करती हैं।

पूर्वी भारत के शहरों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। कोलकाता में सर्दियों के दौरान प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर भारत के कई शहरों में हवा की गति एक मीटर प्रति सेकंड से भी कम हो जाती है और नमी का स्तर बढ़ जाता है। इस कारण वातावरण में वेंटिलेशन यानी हवा के फैलाव की क्षमता कम हो जाती है। आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज़ के प्रमुख साग्निक डे के अनुसार जब हवा की गति बेहद कम होती है तो प्रदूषण के कण जमीन के पास ही जमा रहते हैं और लंबे समय तक वातावरण में बने रहते हैं।

वहीं आईआईएसईआर कोलकाता के पृथ्वी विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक अभिनंदन घोष का कहना है कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियां पश्चिमी देशों से काफी अलग हैं। इसलिए यहां प्रदूषण को समझने और उससे निपटने की रणनीतियां भी अलग तरीके से तैयार करनी होंगी। उनका मानना है कि यदि मौसम को नजरअंदाज करके केवल उत्सर्जन को कम करने की नीतियां बनाई जाएंगी तो उनका असर सीमित रह सकता है।

कोलकाता के संदर्भ में विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सर्दियों के दौरान बायोमास और कचरा जलाना भी प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। बोस इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर अभिजीत चटर्जी के अनुसार कम हवा और अधिक नमी की स्थिति में ऐसे स्रोतों से निकलने वाले कण जमीन के करीब ही जमा हो जाते हैं और हवा को ज्यादा जहरीला बना देते हैं।

रिपोर्ट का निष्कर्ष यह बताता है कि अगर भारत को वास्तव में साफ हवा हासिल करनी है तो केवल प्रदूषण के स्रोतों को कम करना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ-साथ मौसम आधारित रणनीति भी विकसित करनी होगी। विशेषज्ञों का सुझाव है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के अगले चरण में सर्दियों के लिए अलग लक्ष्य तय किए जाएं, मौसम के आधार पर प्रदूषण मापने के तरीके विकसित किए जाएं और मौसम में बदलाव होते ही सक्रिय होने वाली त्वरित कार्रवाई योजनाएं लागू की जाएं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार शहरों की हवा को साफ करने के लिए केवल प्रदूषण घटाना ही काफी नहीं होता, बल्कि यह भी जरूरी होता है कि हवा में मौजूद प्रदूषक कणों को फैलने और बाहर निकलने का मौका मिले। भारत के कई शहरों में यह अवसर अक्सर मौसम की परिस्थितियां ही तय करती हैं। इसलिए भविष्य की वायु प्रदूषण नीतियों में मौसम को केंद्र में रखकर रणनीति बनाने की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-