जबलपुर. मध्य प्रदेश में आस्था, साहस और जज्बे की एक अनोखी कहानी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है. देवास जिले की महज चार साल की मासूम नंदिनी अपने दादा-दादी के साथ लगभग 3000 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा पर निकल पड़ी है. इस उम्र में जहां बच्चे सामान्यतः खेलकूद और स्कूल की दुनिया में व्यस्त रहते हैं, वहीं नंदिनी कठिन और लंबी पदयात्रा कर रही है. उसकी ऊर्जा, उत्साह और उछल-कूद ने रास्ते में मिलने वाले हर व्यक्ति को हैरान कर दिया है.
नर्मदा परिक्रमा को हिंदू परंपरा में एक कठिन तपस्या माना जाता है. इस यात्रा में श्रद्धालु नर्मदा नदी के उद्गम से लेकर उसके संगम तक और फिर वापसी तक पैदल चलते हैं. यह यात्रा करीब 3000 किलोमीटर लंबी होती है और इसमें घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ रास्ते, नदी घाट और दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से गुजरना पड़ता है. आमतौर पर इस यात्रा को शारीरिक रूप से सक्षम वयस्क या बुजुर्ग ही पूरा करते हैं. ऐसे में चार साल की बच्ची का इस यात्रा पर निकलना अपने आप में एक असाधारण घटना बन गई है.
नंदिनी देवास जिले के धूरियां गांव की रहने वाली है. उसके दादा राधेलाल लोगरे, जो पेशे से मजदूर हैं, अपनी पत्नी परसादी और नातिन नंदिनी के साथ इस यात्रा पर निकले हैं. परिवार के अनुसार यह यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक मन्नत पूरी करने का माध्यम है. नंदिनी के दादा बताते हैं कि इस यात्रा के पीछे एक भावनात्मक और संघर्ष से भरी कहानी छिपी है.
राधेलाल के अनुसार, जब नंदिनी का जन्म हुआ, तभी से वह गंभीर बीमारी से जूझ रही थी. कुछ समय बाद उसे ट्यूमर की समस्या हुई, जो आगे चलकर कैंसर में बदल गई. परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी नातिन के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया. इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में इलाज के दौरान करीब तीन लाख रुपये खर्च किए गए, जो एक मजदूर परिवार के लिए बहुत बड़ी राशि थी.
करीब तीन साल तक चले इलाज के बाद भी जब नंदिनी की हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, तो डॉक्टरों ने परिवार को निराशाजनक जवाब दे दिया. डॉक्टरों ने कहा कि कैंसर पूरे शरीर में फैल चुका है और अब ज्यादा उम्मीद नहीं है. यह सुनकर परिवार पूरी तरह टूट गया. ऐसे समय में उन्होंने अपनी आस्था का सहारा लिया और नर्मदा नदी के नेमावर घाट पहुंचे, जहां उन्होंने मन्नत मांगी कि यदि नंदिनी ठीक हो जाती है, तो वे उसे लेकर पैदल नर्मदा परिक्रमा करेंगे.
परिवार के अनुसार, इसके बाद नंदिनी की सेहत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा. कुछ समय बाद जब दोबारा जांच कराई गई, तो रिपोर्ट में यह सामने आया कि उसकी बीमारी पूरी तरह खत्म हो चुकी है. इस चमत्कारी बदलाव को परिवार ने मां नर्मदा की कृपा माना और अपनी मन्नत पूरी करने के लिए यात्रा शुरू करने का निर्णय लिया.
दीपावली के बाद ग्यारस के दिन से यह परिवार नर्मदा के हंडिया घाट से पैदल यात्रा पर निकला है. दादा-दादी के साथ नंदिनी भी रोजाना 15 से 20 किलोमीटर तक पैदल चलती है. परिवार का कहना है कि नंदिनी न केवल बिना थके चलती है, बल्कि पूरे रास्ते में उछलती-कूदती रहती है. उसकी ऊर्जा देखकर लोग हैरान रह जाते हैं. सुरक्षा के लिए उसके पैरों में घुंघरू बांध दिए गए हैं, ताकि उसकी आवाज सुनकर उस पर नजर रखी जा सके.
नंदिनी की दादी परसादी बताती हैं कि जब बच्ची थक जाती है, तो वे उसे गोद में उठा लेते हैं, लेकिन अधिकतर समय वह खुद ही चलना पसंद करती है. रास्ते में जहां भी वे रुकते हैं, स्थानीय लोग नंदिनी को देखकर भावुक हो जाते हैं और उसे स्नेह देते हैं. कई लोग उसकी कहानी सुनकर प्रेरित भी हो रहे हैं.
नंदिनी खुद भी इस यात्रा को लेकर उत्साहित नजर आती है. वह कहती है कि उसे दादा-दादी के साथ घूमने में बहुत मजा आ रहा है और यात्रा पूरी होने के बाद वह पढ़ाई भी शुरू करेगी. छोटी सी उम्र में उसका यह आत्मविश्वास और जज्बा लोगों को प्रभावित कर रहा है.
चिकित्सकों का कहना है कि बच्चों में कैंसर के कुछ मामलों में इलाज के बाद पूरी तरह ठीक होने की संभावना रहती है. हालांकि, नंदिनी के परिवार के लिए यह केवल चिकित्सकीय सुधार नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का परिणाम है. यही वजह है कि वे इस यात्रा को एक धार्मिक कर्तव्य और धन्यवाद के रूप में देख रहे हैं.
इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह दिखाया है कि आस्था और इच्छाशक्ति किस तरह कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी पार कर सकती है. जहां एक ओर यह कहानी चिकित्सा और विज्ञान की उपलब्धियों को दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर यह विश्वास और परंपरा की गहराई को भी उजागर करती है.
जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में जब यह परिवार पहुंचा, तो नंदिनी की कहानी तेजी से फैल गई. लोग उसे देखने और उससे मिलने के लिए उत्सुक नजर आए. कई लोगों ने इसे ‘आस्था का चमत्कार’ बताया, तो कुछ ने इसे एक परिवार के अटूट विश्वास और संघर्ष की मिसाल माना.
फिलहाल, यह यात्रा जारी है और नंदिनी अपने दादा-दादी के साथ हर दिन नए रास्ते तय कर रही है. उसकी मुस्कान, ऊर्जा और जिद यह साबित कर रही है कि हौसले उम्र के मोहताज नहीं होते. यह कहानी न केवल एक परिवार की है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात में भी उम्मीद नहीं छोड़ते.,
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

