प्रधानमंत्री की मिमिक्री पर सस्पेंड शिक्षक को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, निलंबन आदेश पर लगी रोक

प्रधानमंत्री की मिमिक्री पर सस्पेंड शिक्षक को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, निलंबन आदेश पर लगी रोक

प्रेषित समय :19:55:12 PM / Fri, Mar 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ग्वालियर. मध्य प्रदेश में एक चर्चित और संवेदनशील मामले में ग्वालियर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए एक प्राथमिक शिक्षक को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री करते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट करने के कारण निलंबित किए गए शिक्षक साकेत कुमार पुरोहित के मामले में अदालत ने निलंबन आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि निलंबन का अधिकार होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से और ठोस आधार पर किया जाना चाहिए।

यह मामला शिवपुरी जिले के एक प्राथमिक शिक्षक साकेत कुमार पुरोहित से जुड़ा हुआ है, जिन्हें 13 मार्च 2026 को फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करने के बाद शिक्षा विभाग द्वारा निलंबित कर दिया गया था। इस वीडियो में शिक्षक ने बढ़ती महंगाई और विशेष रूप से गैस सिलेंडर के दामों को लेकर व्यंग्यात्मक अंदाज में प्रधानमंत्री की शैली में मिमिक्री की थी। वीडियो में उन्होंने आमजन की समस्याओं को व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया था, लेकिन यह वीडियो सामने आते ही विवाद का कारण बन गया। कुछ लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देखा, जबकि अन्य ने इसे अनुचित और आपत्तिजनक बताया।

वीडियो वायरल होने के बाद पिछोर से भाजपा विधायक प्रीतम लोधी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए संबंधित अधिकारियों से शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलते ही शिक्षा विभाग ने बिना विस्तृत जांच के तत्काल कार्रवाई करते हुए शिक्षक को निलंबित कर दिया और उन्हें बदरवास स्थित बीईओ कार्यालय से अटैच कर दिया गया। विभाग का तर्क था कि एक सरकारी कर्मचारी को सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार की टिप्पणी करना नियमों के विरुद्ध है और इससे प्रशासनिक अनुशासन प्रभावित होता है।

निलंबन के इस आदेश के खिलाफ शिक्षक साकेत कुमार पुरोहित ने हाईकोर्ट की शरण ली और याचिका दायर कर इसे चुनौती दी। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि वीडियो में ऐसा कोई भी कथन नहीं था जिसे मानहानिकारक या नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में रखा जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि यह केवल एक व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति थी, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि विभाग ने बिना किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के जल्दबाजी में निलंबन का आदेश जारी कर दिया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से भी अपना पक्ष रखा गया। शासन के वकील ने कहा कि निलंबन कोई दंड नहीं है, बल्कि यह एक प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना होता है। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षक को निलंबित करने का निर्णय नियमों के तहत लिया गया था और इसका उद्देश्य जांच प्रक्रिया को प्रभावित होने से रोकना था।

हालांकि न्यायमूर्ति आशीष श्रोती की एकल पीठ ने शासन के तर्कों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई के लिए स्पष्ट और ठोस कारण होना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि केवल अधिकार होने के आधार पर किसी कर्मचारी को निलंबित करना उचित नहीं है, बल्कि इसके लिए परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त आधार के की गई ऐसी कार्रवाई प्रशासनिक मनमानी को दर्शाती है और यह कर्मचारियों के अधिकारों का उल्लंघन है।

अदालत ने इस मामले में अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने माना कि विधायक की शिकायत के तुरंत बाद निलंबन आदेश जारी कर देना यह संकेत देता है कि संबंधित अधिकारी ने स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का उपयोग नहीं किया। इसके अलावा अदालत ने यह भी पाया कि वर्ष 2005 में जारी शासन निर्देशों का पालन भी इस मामले में सही तरीके से नहीं किया गया। इन निर्देशों में निलंबन से पहले अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं और आवश्यक मानकों का स्पष्ट उल्लेख है, जिनकी अनदेखी की गई।

इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने प्रथम दृष्टया निलंबन आदेश को त्रुटिपूर्ण और नियमों के विपरीत माना और उस पर रोक लगा दी। साथ ही कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिए कि वह पूरे मामले की दोबारा समीक्षा करे और सभी तथ्यों एवं लागू नियमों को ध्यान में रखते हुए नया निर्णय ले। इस आदेश के बाद शिक्षक को फिलहाल राहत मिल गई है और वे अपनी सेवा में वापस लौट सकते हैं, जब तक कि विभाग नई जांच पूरी कर अंतिम निर्णय नहीं ले लेता।

यह फैसला न केवल इस मामले के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों के लिए भी एक अहम संदेश लेकर आया है। खासकर सोशल मीडिया के दौर में, जहां अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यम उपलब्ध हैं, यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक कार्रवाई करते समय संतुलन और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान आवश्यक है। इस फैसले से यह भी संकेत मिलता है कि न्यायपालिका किसी भी प्रकार की जल्दबाजी या बिना ठोस आधार की गई कार्रवाई को स्वीकार नहीं करेगी।

फिलहाल यह मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक अनुशासन के बीच संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में इस प्रकरण के अंतिम निष्कर्ष और विभागीय निर्णय पर सभी की नजरें बनी रहेंगी।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-