नई दिल्ली. दुनिया भर में जहां एक ओर तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक संघर्ष ऊर्जा संकट को गहरा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक शांत लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बदलाव तेजी से आकार ले रहा है. यह बदलाव उन देशों से आ रहा है जिन्हें लंबे समय तक “कमजोर” या “विकासशील” कहा जाता रहा है, लेकिन अब यही देश स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में नई दिशा तय कर रहे हैं. हाल ही में जारी Ember की रिपोर्ट ने इस बदलाव को आंकड़ों के साथ सामने रखा है, जिसमें बताया गया है कि दुनिया के सबसे ज्यादा जलवायु जोखिम झेल रहे देशों में से लगभग आधे देश अब सोलर ऊर्जा अपनाने के मामले में अमेरिका से आगे निकल चुके हैं.
यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण तेल की कीमतों में फिर से उछाल देखने को मिल रहा है. इसका सबसे अधिक असर उन देशों पर पड़ता है जो पहले से ही ऊर्जा आयात और आर्थिक अस्थिरता की चुनौतियों से जूझ रहे हैं. लेकिन इस बार इन देशों ने केवल संकट झेलने के बजाय उसका समाधान भी खोज लिया है. Climate Vulnerable Forum और V20 Finance Ministers जैसे समूहों से जुड़े 74 देशों में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है, जो करीब 1.7 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इन देशों में आधे से अधिक अब पूरी अर्थव्यवस्था में बिजली के उपयोग यानी इलेक्ट्रिफिकेशन के स्तर पर भी अमेरिका से आगे निकल चुके हैं.
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह तकनीक का विकास नहीं बल्कि उसकी घटती लागत है. पिछले दस वर्षों में सोलर पैनल, बैटरी और इलेक्ट्रिक तकनीकों की कीमतों में 30 प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक की गिरावट आई है. इसका सीधा मतलब यह है कि सोलर ऊर्जा अब केवल पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प नहीं रह गई है, बल्कि कई देशों में यह सबसे सस्ता ऊर्जा स्रोत बन चुकी है. खासकर उन इलाकों में जहां पारंपरिक बिजली ग्रिड पहुंचाना मुश्किल है, वहां छोटे और ऑफ-ग्रिड सोलर सिस्टम ज्यादा प्रभावी और व्यावहारिक साबित हो रहे हैं.
रिपोर्ट में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है कि कई देशों में सोलर ऊर्जा का वास्तविक विस्तार सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है. दस में से आठ देशों में 2017 के बाद सोलर उपकरणों के आयात के आंकड़े इंस्टॉल्ड कैपेसिटी के मुकाबले तीन गुना तक अधिक पाए गए हैं. इससे संकेत मिलता है कि जमीनी स्तर पर एक विकेंद्रीकृत ऊर्जा क्रांति चल रही है, जो आधिकारिक डेटा में पूरी तरह दर्ज भी नहीं हो पा रही है.
यदि उदाहरणों पर नजर डालें तो नामीबिया अपनी कुल बिजली का लगभग 35 प्रतिशत सोलर ऊर्जा से प्राप्त कर रहा है, जबकि टोगो में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. वहीं नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी क्रमशः 70 प्रतिशत और 64 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यह बदलाव केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं है, बल्कि ऊर्जा निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का संकेत है.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्ष 2024 में इन देशों ने लगभग 155 अरब डॉलर केवल जीवाश्म ईंधन के आयात पर खर्च किए. यदि तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो यह खर्च और बढ़ सकता है. ऐसे में सोलर ऊर्जा न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से बल्कि आर्थिक रूप से भी एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रही है.
इन देशों में आज भी करीब 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास बिजली की पहुंच नहीं है और उतने ही लोग अनियमित आपूर्ति की समस्या से जूझ रहे हैं. ऐसे में सोलर और इलेक्ट्रिफिकेशन केवल जलवायु परिवर्तन का समाधान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाने का जरिया बन रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अब “विकास बनाम क्लाइमेट” की बहस धीरे-धीरे खत्म हो रही है और दोनों एक साथ आगे बढ़ सकते हैं.
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, सोलर और बैटरी तकनीकों की गिरती कीमतें न केवल जीवाश्म ईंधन को चुनौती दे रही हैं, बल्कि उन करोड़ों लोगों को भी मुख्यधारा में ला रही हैं जो अब तक ऊर्जा व्यवस्था से बाहर थे. वहीं नीति निर्माताओं का कहना है कि विकासशील देश अब सीधे स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं और पारंपरिक प्रदूषणकारी मॉडल को पीछे छोड़ रहे हैं.
इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन देशों को अब तक पिछड़ा माना जाता था, वही अब ऊर्जा परिवर्तन की दिशा तय कर रहे हैं. यह बदलाव न केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करेगा बल्कि आने वाले समय में जलवायु नीति और आर्थिक रणनीतियों को भी नई दिशा देगा.नई दिल्ली.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

