हाईकोर्ट का बड़ा फैसला सरनेम बदलने से नहीं रुकेंगे रेलवे कर्मचारी की पत्नी के सेवा लाभ

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला सरनेम बदलने से नहीं रुकेंगे रेलवे कर्मचारी की पत्नी के सेवा लाभ

प्रेषित समय :13:10:40 PM / Fri, Apr 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर .  सरनेम के फेर में फंसी महिला को बड़ी राहत देते हुए न्यायालय ने पश्चिम मध्य रेलवे के अड़ियल रवैये पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायाधीश रिशा अहमद कुरैशी की अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि विवाह के पश्चात सरनेम बदलने मात्र से किसी व्यक्ति की पहचान नहीं बदलती और रेलवे प्रशासन को मृत कर्मचारी की पत्नी का बकाया भुगतान तत्काल करने के आदेश दिए हैं । दरअसल यह पूरा मामला जबलपुर मंडल में कार्यरत टेक्नीशियन-1 के पद से जुड़ा है, जिनका निधन 15 जुलाई 2024 को हो गया था 。उनके देहावसान के बाद जब उनकी पत्नी ने अपने पति के सेवा लाभों और अंतिम भुगतान के लिए आवेदन किया, तो रेलवे प्रशासन ने दस्तावेजों में नाम की विसंगति का हवाला देते हुए भुगतान रोक दिया था 。 रेलवे का तर्क था कि वादिनी के अलग-अलग कागजातों में दर्ज नाम आपस में मेल नहीं खाते, इसलिए उसे न्यायालय से आधिकारिक घोषणा (डिक्लेरेशन) लानी होगी 。

इस तकनीकी अड़चन के खिलाफ महिला ने कानूनी लड़ाई शुरू की, जिसमें उनके अधिवक्ता शिवम गुप्ता ने अदालत के समक्ष महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किए 。 अधिवक्ता ने दलील दी कि दस्तावेजों में दिख रहा अंतर केवल विवाह के उपरांत होने वाले स्वाभाविक सरनेम परिवर्तन के कारण है । कोर्ट में इसके समर्थन में नोटराइज्ड शपथ पत्र और अन्य पूरक प्रमाण भी पेश किए गए。 हालांकि, रेलवे की ओर से इस दावे का विरोध करते हुए दलील दी गई थी कि विवाह से संबंधित पर्याप्त दस्तावेज नहीं होने के कारण इस याचिका को निरस्त किया जाना चाहिए 。 दोनों पक्षों की दलीलों और सूक्ष्म साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद तृतीय व्यवहार न्यायाधीश रिशा अहमद कुरैशी ने 18 मार्च 2026 को अपने फैसले में रेलवे की आपत्तियों को दरकिनार कर दिया 。

अदालत ने अपने निर्णय में वादिनी के सभी अलग-अलग नामों को एक ही व्यक्ति का घोषित करते हुए उन्हें वैधानिक मान्यता प्रदान की है । न्यायाधीश ने रेलवे प्रशासन को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया कि भुगतान की रुकी हुई शेष प्रक्रिया को अविलंब पूर्ण किया जाए । इसके साथ ही कोर्ट ने एक बड़ा आदेश यह भी दिया कि इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में महिला का जो भी खर्च हुआ है, उसका वहन भी पश्चिम मध्य रेलवे प्रशासन द्वारा ही किया जाएगा । लगभग 16 माह तक चली इस कानूनी लड़ाई के अंत में आए इस फैसले ने उन महिलाओं के लिए एक नजीर पेश की है जिन्हें प्रशासनिक जटिलताओं के कारण अपने जायज हक के लिए भटकना पड़ता है 

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-