मुंबई. केंद्र सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने हवाई यात्रियों को राहत देने के उद्देश्य से लागू किए गए 60 प्रतिशत फ्री सीट चयन नियम पर फिलहाल रोक लगा दी है. यह फैसला लागू होने के महज 16 दिनों के भीतर लिया गया, जिससे साफ संकेत मिलते हैं कि एयरलाइंस कंपनियों के दबाव और आर्थिक चिंताओं का असर नीतिगत फैसलों पर पड़ा है. मंत्रालय ने यह निर्देश नागरिक उड्डयन महानिदेशालय को भेजते हुए स्पष्ट किया है कि इस नियम को व्यापक समीक्षा पूरी होने तक स्थगित रखा जाएगा.
दरअसल, 17 मार्च को जारी इस नियम के तहत घरेलू एयरलाइंस को अपने विमानों में कम से कम 60 प्रतिशत सीटें बिना अतिरिक्त शुल्क के उपलब्ध करानी थीं. इसका उद्देश्य यात्रियों को वेब चेक-इन के दौरान मनमानी फीस से राहत देना और सीट चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना था. लेकिन इस फैसले के बाद एयरलाइंस कंपनियों ने इसे अपने राजस्व मॉडल के लिए खतरा बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया.
एयरलाइंस का तर्क था कि मौजूदा समय में टिकट के बेस किराए को कम रखने के लिए वे सहायक सेवाओं जैसे सीट चयन, अतिरिक्त सामान और अन्य सुविधाओं से होने वाली कमाई पर काफी हद तक निर्भर हैं. ऐसे में यदि बड़ी संख्या में सीटें मुफ्त कर दी जाती हैं, तो उन्हें नुकसान की भरपाई के लिए टिकट की मूल कीमत बढ़ानी पड़ सकती है, जिसका असर अंततः यात्रियों पर ही पड़ेगा. यही नहीं, कंपनियों ने यह भी आशंका जताई कि इससे सेवाओं की गुणवत्ता और रूट संचालन पर भी असर पड़ सकता है.
फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (FIA), जिसमें प्रमुख कंपनियां शामिल हैं, ने सरकार के सामने औपचारिक आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि यह कदम मौजूदा डीरिगुलेटेड टैरिफ सिस्टम के खिलाफ है. इसके बाद मंत्रालय ने मामले की समीक्षा का निर्णय लिया और फिलहाल इस नियम को होल्ड पर रखने का आदेश जारी कर दिया.
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यात्रियों की सुविधा से जुड़े अन्य प्रावधान अभी भी लागू रहेंगे. इसमें सीट आवंटन में पारदर्शिता, एक ही पीएनआर पर यात्रा कर रहे यात्रियों को साथ बैठाने की व्यवस्था, संगीत वाद्ययंत्र, खेल उपकरण और पालतू जानवरों के परिवहन से जुड़े नियम शामिल हैं. इन उपायों को यात्रियों के हित में जारी रखा जाएगा.
इधर, इंडियन एसोसिएशन ऑफ टूर ऑपरेटर्स (IATO) ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है. संगठन का मानना है कि यह कदम संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिससे एयरलाइंस उद्योग की आर्थिक स्थिरता बनी रहेगी और यात्रियों के हित भी सुरक्षित रहेंगे. हालांकि, संगठन ने सरकार से यह भी आग्रह किया है कि यात्रियों को राहत देने के लिए व्यापक नियम लागू करने के बजाय मौसमी सब्सिडी, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा और कम सेवा वाले रूट्स पर विशेष प्रोत्साहन जैसे विकल्पों पर विचार किया जाए.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नियम लागू रहता, तो अल्पकालिक रूप से यात्रियों को राहत जरूर मिलती, लेकिन लंबे समय में टिकट की कीमतों में बढ़ोतरी और सेवाओं में कटौती देखने को मिल सकती थी. ऐसे में सरकार का यह कदम फिलहाल संतुलन बनाने की दिशा में एक अहम निर्णय माना जा रहा है.
अब नजर इस बात पर है कि समीक्षा के बाद सरकार इस नीति में क्या बदलाव करती है और क्या यात्रियों को भविष्य में सीट चयन शुल्क से राहत मिल पाएगी या नहीं. फिलहाल के लिए यह स्पष्ट है कि हवाई यात्रा के इस अहम मुद्दे पर सरकार और एयरलाइंस के बीच संतुलन साधने की कोशिश जारी है.
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