रागिनी कुमारी (सीतामढ़ी, बिहार)
स्वच्छता किसी भी सभ्य समाज की बुनियादी पहचान और मानवीय गरिमा का प्रतीक है. यह केवल स्वास्थ्य मानकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक विकास और आत्मसम्मान से भी गहराई से जुड़ी है. बिहार का सीमावर्ती जिला सीतामढ़ी, जो नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटा है, पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में एक बड़े बदलाव का साक्षी बना है. विशेष रूप से रीगा प्रखंड के ललितपुर गांव जैसे क्षेत्रों में आज सफाई का जो स्तर दिखता है, वह दशकों पुरानी तस्वीर से बिल्कुल भिन्न है.
अतीत की चुनौतियां और बदलाव की सुगबुगाहट
कुछ वर्ष पहले तक सीतामढ़ी के ग्रामीण इलाकों में 'खुले में शौच' एक विवशता और आम समस्या थी. गांव की गलियों और खेतों के किनारों पर फैली गंदगी न केवल वातावरण को दूषित करती थी, बल्कि मलेरिया, डायरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों का मुख्य कारण भी थी. वर्ष 2014 में स्वच्छ भारत मिशन के आगाज के साथ इस जड़ता में दरार पड़नी शुरू हुई. ललितपुर जैसे गांवों में अब लगभग हर घर की अपनी 'इज्जत घर' (शौचालय) है. सुबह-शाम खेतों की ओर जाने वाली कतारें अब इतिहास का हिस्सा बनती जा रही हैं.
प्रोत्साहन राशि और ठोस आंकड़े
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की सफलता के पीछे एक बड़ा कारण वित्तीय प्रोत्साहन रहा है. पात्र परिवारों को शौचालय निर्माण के लिए 12,000 रुपये की सहायता दी जाती है, जिसमें केंद्र (60%) और राज्य सरकार (40%) की संयुक्त भागीदारी होती है.
व्यापक प्रभाव: इस मिशन ने देश के 10 मिलियन से अधिक ग्रामीण परिवारों को शौचालय की सुविधा दी, जिससे 6.30 लाख गांवों के लगभग 5 करोड़ लोग लाभान्वित हुए.
महिला सुरक्षा: यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 93% ग्रामीण महिलाएं घर में शौचालय होने के बाद स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं.
कचरा प्रबंधन: अगले चरण की तैयारी
केवल शौचालय निर्माण ही काफी नहीं है; अब ध्यान ठोस और तरल कचरा प्रबंधन (SLWM) पर है. ललितपुर जैसे गांवों में अब लोग कूड़ा अलग-अलग डिब्बों में इकट्ठा करने लगे हैं. स्वच्छ भारत मिशन के दूसरे चरण में गांवों में कंपोस्ट पिट्स और प्लास्टिक प्रबंधन इकाइयों के लिए विशेष वित्तीय सहायता दी जा रही है. छोटे गांवों में प्रति व्यक्ति कचरा प्रबंधन के लिए निर्धारित राशि ने इस प्रक्रिया को और अधिक व्यवस्थित बनाया है.
बजटीय प्रावधान और सरकारी संकल्प
वित्तीय वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में स्वच्छता को प्राथमिकता दी गई है.
कुल 9,692 करोड़ रुपये के प्रावधान में से ग्रामीण स्वच्छता के लिए 7,192 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.
बिहार सरकार ने भी पंचायतों को विशेष अनुदान देकर इस कड़ी को मजबूत किया है. स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में बेहतर स्वच्छता सुविधाओं के कारण छात्राओं की उपस्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है, जो सीधे तौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के अंतर्संबंधों को दर्शाता है.
मौजूद चुनौतियां और समाधान की राह
सुधार के बावजूद कुछ चुनौतियां आज भी खड़ी हैं:
व्यवहार परिवर्तन: कई स्थानों पर शौचालय होने के बावजूद पुराने संस्कारों के कारण उसका नियमित उपयोग नहीं होता.
संसाधनों की कमी: कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण (Scientific Disposal) के लिए तकनीकी ज्ञान और स्थायी मशीनरी का अभाव है.
सामुदायिक सहभागिता: स्वच्छता को केवल 'सरकारी योजना' समझने की प्रवृत्ति को बदलना होगा.
निष्कर्ष: जीवनशैली का हिस्सा बने स्वच्छता
यदि हमें देश के सभी गांवों को शत-प्रतिशत ODF प्लस बनाना है, तो तीन स्तरों पर काम करना होगा:
आदत का विकास: शौचालय निर्माण के साथ-साथ उसके नियमित उपयोग और रखरखाव की संस्कृति विकसित करनी होगी.
स्थायी निस्तारण: ग्राम स्तर पर कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उसके उचित निस्तारण की व्यवस्था.
सतत जागरूकता: पंचायतों और स्कूलों के माध्यम से स्वच्छता को एक 'इवेंट' के बजाय 'जीवनशैली' का हिस्सा बनाना.
सीतामढ़ी के ललितपुर जैसे गांवों की बदलती तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन-भागीदारी मिलकर सदियों पुरानी समस्याओं का अंत कर सकती है.
(लेखिका के निजी विचार हैं)
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

