समंदर का बढ़ता पानी अब इंसानी सेहत पर सीधा हमला बनकर उभर रहा

समंदर का बढ़ता पानी अब इंसानी सेहत पर सीधा हमला बनकर उभर रहा

प्रेषित समय :19:40:23 PM / Thu, Apr 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. सुबह का शांत समय है. तटीय इलाकों में लोग अपने रोजमर्रा के काम में लगे हुए हैं, लेकिन इस सामान्य दिखने वाली दिनचर्या के पीछे एक गहरी और खामोश चिंता धीरे-धीरे आकार ले रही है. समुद्र का पानी अब पहले से थोड़ा और अंदर तक घुस आया है. खेतों की सीमाएं बदल रही हैं, कुओं का पानी खारा होता जा रहा है और जीवन के छोटे-छोटे संकेत एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं. यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हो रहा है, इसलिए इसे नजरअंदाज करना आसान है, लेकिन इसका असर गहरा और दूरगामी है.

दुनिया अब इस खामोश खतरे को समझने की कोशिश कर रही है. 8 अप्रैल 2026 को प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित नई पहल ‘Lancet Commission on Sea-Level Rise, Health and Justice’ ने इस मुद्दे को एक नए नजरिए से सामने रखा है. यह केवल समुद्र के स्तर में वृद्धि की पर्यावरणीय कहानी नहीं है, बल्कि यह इंसानी सेहत, जीवन और सामाजिक न्याय से जुड़ा गंभीर संकट बन चुका है.

इस कमीशन में 26 वैश्विक विशेषज्ञ शामिल हैं, जिनका उद्देश्य यह समझना है कि समुद्र के बढ़ते स्तर का मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और इससे निपटने के लिए दुनिया को किस दिशा में कदम उठाने चाहिए. अब तक समुद्र के बढ़ने को मुख्यतः जलवायु परिवर्तन या पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन इस रिपोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि यह एक उभरती हुई पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है, जो पहले से ही लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है.

रिपोर्ट के अनुसार समुद्र का बढ़ता पानी केवल जमीन को ही नहीं निगल रहा है, बल्कि यह पीने के पानी के स्रोतों को दूषित कर रहा है, कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहा है और बीमारियों के स्वरूप में भी बदलाव ला रहा है. खारे पानी के प्रवेश से भूजल की गुणवत्ता गिर रही है, जिससे पीने के पानी की समस्या गंभीर होती जा रही है. इसके साथ ही मच्छरों और जलजनित रोगों का खतरा भी बढ़ रहा है.

अनुमान है कि इस सदी के अंत तक करीब 41 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहने को मजबूर होंगे जो उच्च ज्वार के स्तर से नीचे होंगे. इसका अर्थ है कि हर बार ज्वार आने पर उनके घरों तक पानी पहुंचने का खतरा बना रहेगा. यह स्थिति केवल भौगोलिक संकट नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जीवन, आजीविका और स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला मुद्दा है.

कमीशन की सह-अध्यक्ष Christiana Figueres ने इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि समुद्र का बढ़ना अब भविष्य की समस्या नहीं रहा, बल्कि यह वर्तमान में लोगों की सेहत, रोजगार और जीवन को प्रभावित कर रहा है. खासतौर पर वे समुदाय, जिन्होंने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया है, आज सबसे ज्यादा इसके प्रभाव को झेल रहे हैं.

यह स्थिति जलवायु न्याय के सवाल को भी सामने लाती है. तटीय क्षेत्रों में रहने वाले गरीब समुदाय, छोटे द्वीपों के निवासी और कमजोर वर्ग इस संकट का सबसे पहला और सबसे गंभीर प्रभाव झेल रहे हैं, जबकि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन मुख्य रूप से विकसित और औद्योगिक क्षेत्रों से होता है. इस असमानता को रेखांकित करते हुए कमीशन से जुड़ी विशेषज्ञ Kathryn Bowen ने कहा कि समुद्र के हर सेंटीमीटर बढ़ने के साथ असमानता भी बढ़ती है और इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जो इसके लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं.

समुद्र के बढ़ते स्तर का असर केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है. जब लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं, रोजगार के अवसर खत्म हो जाते हैं और भविष्य अनिश्चित हो जाता है, तो इसका सीधा असर मानसिक स्थिति पर पड़ता है. चिंता, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं.

Sandro Demaio, जो WHO Asia-Pacific Centre for Environment and Health के निदेशक हैं, ने इसे एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा है. उनका कहना है कि समुद्र का बढ़ना अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है और यदि इस पर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो यह लाखों लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल सकता है.

यह रिपोर्ट केवल खतरे की ओर इशारा नहीं करती, बल्कि समाधान की दिशा भी सुझाती है. इसमें कहा गया है कि देशों को ऐसे कदम उठाने होंगे जो वैज्ञानिक आधार पर टिके हों और साथ ही सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण भी हों. केवल मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि ये समाधान सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचें.

समुद्र के बढ़ने की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह प्रक्रिया धीमी है, लेकिन इसके प्रभाव अचानक सामने आते हैं. कभी एक दिन अचानक पानी घरों में घुस जाता है, कभी एक मौसम में पूरी फसल बर्बाद हो जाती है और कभी एक तूफान पूरे समुदाय को तबाह कर देता है. यह अनिश्चितता ही इस संकट को और गंभीर बना देती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा यही है कि लोग इसे धीरे-धीरे होने वाली प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज करते रहते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि यह संकट अब हमारे जीवन के हर पहलू में प्रवेश कर चुका है—हमारे खाने, पीने के पानी और हमारे स्वास्थ्य तक.

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि समुद्र का स्तर कितना बढ़ेगा, बल्कि यह है कि हम इसे कब तक केवल तटीय क्षेत्रों की समस्या मानते रहेंगे. क्योंकि सच्चाई यह है कि यह खतरा अब सीमाओं को पार कर चुका है और मानव जीवन के केंद्र तक पहुंच गया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-